सोमवार, 5 दिसंबर 2011

कब उसने जाना है ....



बादल से उसका  कुछ रिश्ता पुराना है ,
बरसात का इन आँखों से गहरा याराना है ..
......
अपनी ही उड़ानों से फुर्सत उसे कब कहाँ ,
किस धरती पर बरसा था कब उसने जाना है .....

.........

रविवार, 27 नवंबर 2011

बीज और जड़


बीज 
जब बोया 
था एक भाव ...
अंकुरित ,
पल्लवित ,और फिर 
हो गया 
फलीभूत 
एक सुंदर 
रचना में ....
निहारा 
संवारा 
फ़ैल गई वो 
छाया बनकर ....
पक्षी 
चहचहा उठे 
बूँदें 
थिरकने लगी 
पत्तियां 
जगमगाने लगी 
और, हवाएं 
महक उठी.. 
उस मीठी 
खुशबू से ....

इधर 
कई दिन से 
कुछ सेहतमंद लोग 
हो गए है 
जागरूक 
जब देखो ,तब 
उठा लेते है 
पत्थर 
ढांपने लगे है 
पैरों तले की 
जमीन .........

कौन समझाये 
????????

पक्के फर्श पर 
नहीं उगा करते 
पेड़......
और फैली जडें 
उखाड़ फैंकती है 
पत्थरों  को भी ..................

("काव्य-लहरी " में प्रकाशित )












गुरुवार, 3 नवंबर 2011

राधा .....




राधा तो धारा है 

जो आज भी बहती है 

तेरे मेरे चितवन के ,

गहरे सागर में रहती है ......
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                        

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

तू जवाब बनी रह ,बस ..


कुछ दिन पहले इमरोज़ जी से जब मिली थी तो किसी से बात करते हुए वो घर का पता बदलने कि बात कह रहे थे ,पर मैं पलट कर सवाल नहीं कर पायी क्यूंकि अक्सर जब भी मिलती हूँ  सवाल कर ही नहीं पाती सिर्फ देखती ,सुनती रहती हूँ वो जो भी कहते हैं ,शायद इसलिए कि अमृता इमरोज़ एक ही दिखते है .पर एक सवाल भीतर ही भीतर कुलबुला रहा था ऐसी कौन सी वजह है जिसके चलते ये फैसला इमरोज़ जी ने लिया ,कौन  सी मजबूरी ..हालाँकि इस शब्द से वो कोसो दूर है ...फिर क्यूँ .......ये क्यूँ आज भी बरकरार है .......पर आज एक बार फिर दिल पर गहरा आघात हुआ "ये सच है " ये जानकर ...जैसे अमृता के जाने के वक्त हुआ था , वो दर्द कुछ कम हुआ था इमरोज़ से रूबरू होने के बाद ..
              ये अच्छा हुआ या बुरा ,उचित अनुचित ,पता नहीं पर मेरी आँख में पलता सपना टूट गया ,जैसे कोई अपना छूट गया, अब ढूँढने को दुनिया हो गई ,मंदिर  में स्थापित मूर्त खो गई....
सोच रही हूँ क्या इमरोज़ उस घर के बिना रह पाएंगे ,जहाँ आज भी अमृता बोलती रही है उनके अकेलेपन में ,हंसती, खिलखिलाती,गुनगुनाती,इशारों में बतियाती हर पल हर लम्हा साथ साथ चलती रही है  ,इस सबके साक्षात गवाह इमरोज़ स्वयं है उनका चेहरा ,उनकी आँखे जो,अमृता के चाहने वालों की भीड़ में...अमृता की बात करते करते बरबस उस प्रेम से भीग जाती है, ये जाने कितनी बार ,बार बार ,हर बार होता रहा है .....होता रहेगा....

                         फिर ये सवाल जेहन को क्यूँ भ्रमित कर रहा है..एक  ईंट गारे का घर ,दूसरा जीवंत ,सांस लेता घर जहाँ भी होगा अमृता वहीँ होगी ....निशानियाँ मरने वालों की संभाली जाती है ,जो जीवित हैं उनका जीवन प्रेरणा की अमिट निशानी है  .....सोचा...! सोचा...!समझा ...तो मन भीग गया उस सत्यता की रौशनी से ......
जिसने  मनचाही जिंदगी जी ... खामोश मौत को चुना.. जो सारे कर्मकांडो को तोडकर ,मिटटी के बिछोने पर,मनचाही चादर ओढ़ कर ,मिटटी में बीज सी घुल  गई ...वो अनश्वर ,नश्वरता को कैसे तरजीह दे ....जीवन जीना अनश्वर की और ले जा है,तो जीवन बिताना नश्वरता से जोड़ कर बन्धनों में बांधता है ....जो उसे जकड नही पाए और इमरोज़ जी को पकड़ नहीं पाए .....कुछ न कह कर भी बहुत कुछ कह जाते हैं इमरोज़ ,कहने पे आयें तो यूँ ...जैसे सूरज का रोज़ निकलना और फिर छुप जाना.....
                   सवाल कभी नहीं किया ,और करूं तो कैसे ...."अमृता इमरोज़ के ख़त " का अंग्रेजी अनुवाद पुस्तक के विमोचन पर इमरोज़ जी से मिली ,बहुत सी बातें हुई ...इमरोज़ जी को कार्यक्रम के फ़ौरन बाद वापस जाना था इस अचानक के पीछे की वजह भी निश्छल ,बिलकुल उनके जैसी ..हालाँकि अगले दिन एक और विमोचन उन्हें करना था जिसके लिए ख़ास वो चंडीगढ़ आये थे ....पर इंसानियत ...मुंबई से कोई आम सा इंसान ,मेरे जैसा,अमृता जी का पाठक उनके घर आ रहा था ,और दोनों प्रोग्राम एक ही दिन हो गए ,अपनी गलती को स्वीकार भी किया ...दो अखबारों में खबर  या रचना छपते ही बड़े ,और दो किताबें आते ही बड़े लेखक का तगमा टंग जाता है नाम के साथ ,पर इतनी ऊंचाई पर भी वो इंसान इतना सरल, इतना सहज .....
                   खैर ये वाकया अकेला नहीं....जब भी मिलती हूँ  , हर बार बहुत कुछ ऐसा मिलता है मुझे .....
बात सवाल की थी ,उस दिन जब इमरोज़ जी जाने लगे -क्यूंकि ज्यादा बात नहीं हो पाई थी ,कुछ कहने लगी .......पर रोक दिया वहीँ .............बोले " तू जवाब बनी रह ,बस ......"......शायद उन्हें लगा कि मैं कोई सवाल करने वाली हूँ उस भीड़ की तरह.................नहीं ,  पर एक ? की तरह ये बात कई दिन ,शायद आज भी मेरे सामने है ....नहीं पूछ पाई ऐसा क्यूँ कहा ....किसलिए कहा ...जो कहा सादर सा उतर गया भीतर .....और अब इसके बाद तो कोई गुंजाईश ही नहीं सवाल की .....
बहुत सी बातें हैं ,मुलाकातें है ....कभी शब्दों में पिरो लेती हूँ ,कभी बादल सी रो लेती हूँ ,और कभी रूह को भिगो लेती हूँ ........................कुछ बातें अगली पोस्ट पर सांझा करूंगी ....इस बात को लिखे भी महीने हो गए ....पर ब्लॉग पे आज पोस्ट कर रही हूँ ,बस यूँ ही आज बैठे- बैठे मन हुआ कुछ अमृता की बात की जाये तो ...कह दिया ,
कुछ अमृता को समर्पित कवितायेँ अगले सप्ताह पोस्ट करूंगी ....दिवाली के बाद ....शुभकामनाएं  



 आप सभी को दीपावली की हार्दिक मंगल कामनाएं 

सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

ग़ज़ल गायक "जगजीत सिंह"



एक आवाज़ ,एक सुकून,समंदर की वो लहर जो अक्सर खोये खोये दिलों को भिगो कर कहीं दूर गहराईओं में ले जाती थी ,और शांत अहसास में डूब जाते थे वो भीगे मन ,आज वो आवाज़ शांत ,खामोश हो गई .......
पर कहने को ,क्यूंकि ऐसी रूहानी शक्तियां शरीर से भले दिखाई न दें ...पर हमेशा हमारे आस पास मोजूद रहती है क्यूंकि  कला मरती नहीं ....
"एक मुसाफिर है ,सफर  है सबकी दुनिया 
कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला "(HOPE..SINGER JAGJIT SINGH) 
ये कमी तो रहेगी .....कलाकार समाज ,देश को जो देता है उसे महफूज़ रखकर ,उसके होने को बरकरार रखा जा सकता है ...यही सच्ची  श्रद्धांजलि  है एक कलाकार के लिए  .....
उन्ही की गाई एक ग़ज़ल के चंद अशआर.....

मंजिल न दे चराग न दे ,हौंसला तो दे 
तिनके का ही सही तू आसरा तो दे ...
मैंने ये कब कहा ,कि मेरे हक में हो जवाब 
लेकिन खामोश क्यूँ है ,कोई फैसला तो दे 
बरसों मैं तेरे नाम पे खाता रहा फरेब 
मेरे खुदा कहाँ है तू ....अपना पता तो दे ........
मेरे खुदा कहाँ है तू ....अपना पता तो दे ........

और आज वो पता उन्हें मिल गया ..........
वही सुकून जो इस दुनिया ,हमारे मन को उन्होंने अपनी गायकी से दिया ,वही उनकी रूह को खुदा प्रदान करे ...
उनके सफर को परवान करे .....यही प्रार्थना  करते हैं .......

(हार्दिक  समर्पित....)
"दर्द ही उसका हमदम रहा 
सुरों से सहलाता जख्म रहा 
खोने पाने की भीड़ के घेरे में 
ताल मिलाता वो हर कदम रहा ....." 



मंगलवार, 27 सितंबर 2011

तुम.....

तुम झूठ  पे झूठ कहते रहे

मैं यकीं पे यकीं चिनती रही ....

मेरे यकीं के पुल के नीचे से 

तेरे झूठ की नदी बहती रही ... 

सोमवार, 12 सितंबर 2011

चिंता ....?????

दीवार में 
उग आये 
पेड़ का 
विरोध ....? ? 
चिन्ता 
पेड़ के पनपने 
और 
जगह के अभाव की नहीं 
फैली जड़ों से 
खुद की 
दीवारों के 
ढह जाने की थी ...
(" काव्य-लहरी " में प्रकाशित )

शनिवार, 27 अगस्त 2011

एहसास




हर बात से डर लगता है 
हर बात पे सहम जाते है 

जब झूठ के मेले में, एहसास 
बच्चे से कहीं खो जाते हैं .......

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

रिश्ते

रिश्ते 

नहीं होते

 मोहताज़ 

वक्त के... 

जो होते है 

वो रिश्ते नहीं

होते हैं

 महज़

टाइम पास.....

रविवार, 7 अगस्त 2011

दोस्त

दोस्त 
दो सत 
जैसे सूरज 
जैसे सागर 
तभी तो 

होता है विरक्त ...
रज से 
तम से 
बंधता है सम 
सिर्फ 
सत से ......

सोमवार, 11 जुलाई 2011

बुधवार, 8 जून 2011

अंतर

अंतर है 
मंदिर के पत्थर 
और 
रास्ते के पत्थर 
 में 
इतना ही 
एक पर 
विश्वास किया 
तुमने ...
और 
दूसरे ने 
तुम पर .......

मंगलवार, 17 मई 2011

सुर और ताल

वेद'
बन गए वाद
'शास्त्र'
बन गए शस्त्र
और ‘गीता’
रह गई बन कर गीत
'कौन हैं' जो
सुर पहचाने
'कौन है' जो
ताल मिलाए
बैठे हैं सब के सब
जाल बिछाए......

अधिकार ..............

अधिकार खरपतवार हो गए
कर्त्तव्य दरकिनार हो गए .....
अत्याचार बढ़े इतने
कानून खुद शिकार हो गए .....
अर्थ जाल का बोलबाला
शब्दकोष निस्सार हो गए .....
बेलें बन गई पेड़ यहाँ पर
पेड़ गुनाहगार हो गए .....
कौन सुनेगा, किस से कहोगे
गूंगे बहरे राजदार हो गए .....
देख, सुन, और ओढ़ ले चुप्पी
साये तक दीवार हो गए .....
सोच हुई गुलाम जिस्म की
जिस्म अब अखबार हो गए .....
अच्छे लोग बहुत यहाँ है
बुरे अब दुशवार हो गए .....
सोच के दायरे फैले इतने
रिश्ते तक व्यापार हो गए .....


(" दैनिक ट्रिब्यून चंडीगढ़ में प्रकाशित )

शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

आदत.......................................


सागर गहरा था,
हो गया
और गहरा -
जब से
डूबना
आदत सी हो गया....  








आदत .....

तेरी आदत से तू मजबूर ...

मेरी आदत से मैं ....

अपनी अपनी आदत से देखें

दोनों चलते हैं कितनी दूर ........!!

           




आदत .......
जब हो जाये तो जाती भी नही ....
उसके बिना कोई शै भाती भी नही ...... :(  :(