सोमवार, 26 दिसंबर 2011

कान्हा ,कहाँ लिख पाऊँगी ...




कान्हा 
कहाँ लिख पाऊँगी 
मैं ,राधा के प्रेम को .....
लिखा जा सकता ,तो 
लिख देती 'वो '
स्वयं.......
लिखना तो दूर ,
कहा भी तो नही 
कभी उसने .....!!
बस किया ...
तुमसे प्रेम ,और 
किया भी ऐसे 
कि खुद 
हो गई 
प्रेम स्वरूपा.. 
और तुम्हे 
बना लिया 
अनन्य भक्त.....! 
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
इसलिए, कान्हा..!
मत होना नाराज़ ,
नही लिख पाऊँगी 
मैं कभी 
चाह कर भी .....
पर हाँ ,देना मुझको 
वो दृष्टि ....
पढ़ पाऊं 
उस नेह को ...
प्रेममयी आँखों की 
मुस्कान में ...
तेरी बांसुरी की 
तान में ...
उसके चरणों की 
थकान में ...
तेरे हाथों की 
पहचान में ...
आंसुओं के 
आह्वान में ...
भक्ति के 
विरह -गान में ...
दो रूप 
एक प्राण में ...!
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
प्रेम ,भक्ति की 
यही गलबहियां 
खींच लेती है मुझे ....
आत्मविभोर हो 
खिल उठती हूँ ...
फ़ैल जाते हैं होंठ 
खुद ब खुद ही ...
देखती हूँ ,
कनखियों से ,
सकुचाहट के साथ ...
मुस्कुरा देते हो 
तुम भी 
राधा के साथ ......!!!
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बस ,कान्हा ...! 
यहीं से ,
होता है शुरू 
एक सफ़र .....
हवाओं के उठने का ...
समंदर में उतरने का ...
बादल के बनने का ...
आसमान में उड़ने का ...
बरसात के होने का ..
मिटटी के भीगने का ...
फूलों के खिलने का ...
महक के बिखरने का ...!!!!
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
इससे पहले कि 
बिखर जाऊं ...
तान देते हो 
चादर झिलमिल सी ....
छोड़ देते हो मुझे 
फिर एक और ...
यात्रा के लिए .....
.......................
पर ,सुनो कान्हा ..!!
राह भी तेरी ...
यात्रा भी तेरी ...
पर मंजिल 
है मेरी ...!
इसलिए कान्हा ...!!!
न भूलना 'तुम '
कभी ये बात ........
क्यूंकि 
यात्रा ,
कितनी भी लम्बी हो ...
राह , 
कितनी भी कठिन हो ...
मंजिल तो 
निश्चित है ........./
इसलिए कान्हा ...!
बिखर जाने दे ...
उतर जाने दे ...
हो जाने दे 
समंदर ....
शायद ,तब 
कह पाऊं ...
लिख पाऊं ....
कुछ ऐसा 
जो हो बिलकुल 
तेरी राधा के जैसा ..........
तेरी वंशी के प्राण जैसा .......

अनुगूंज..


अनुगूंज.....

प्रेम 


लेता है जन्म 

काराग्रह में .....

विषमता के 

समंदर से 

गुजरता ...

खिलता है 

यमुना तट पे ...

धड़क उठता है,  

मधुबन, 

उसकी महक के 

स्पर्श से ......
...............

और फिर 

गूंज उठता है 

अनूगूंज सा ....

मंदिर के 

अनहद 

नाद में .....



मंगलवार, 13 दिसंबर 2011

तारुफ़ मेरा....

जब से ,पकड़ा है तूने , हाथ ये मेरा...

छूटता जा रहा ,जग से ,ताल्लुक मेरा ....../
.................................................

रात भर ,हरसिंगार सा,मैं खिलता रहा .... 

हर सुबह रहता है ,तेरी आँखों में ,तारुफ़ मेरा...../
...........................................................

न मैं मीरा बनी, न मैं राधा हुई ...

रिश्ता तुझसे बहुत ही है नाज़ुक मेरा ......./
......................................

सोमवार, 5 दिसंबर 2011

कब उसने जाना है ....



बादल से उसका  कुछ रिश्ता पुराना है ,
बरसात का इन आँखों से गहरा याराना है ..
......
अपनी ही उड़ानों से फुर्सत उसे कब कहाँ ,
किस धरती पर बरसा था कब उसने जाना है .....

.........

गुरुवार, 1 दिसंबर 2011

प्रेम .....!!!!!!





प्रेम .....!!!!!!
नहीं किया
कभी भी मैंने ,,
..........फिर ...........
परिभाषा
कैसे बतलाती
 तुमको ......?


जब हुआ
हो गया
'सिर्फ '...
"उसी" से .....
होना था 
जिस किसी से  .......!!!!!!!!!!.

रविवार, 27 नवंबर 2011

बीज और जड़


बीज 
जब बोया 
था एक भाव ...
अंकुरित ,
पल्लवित ,और फिर 
हो गया 
फलीभूत 
एक सुंदर 
रचना में ....
निहारा 
संवारा 
फ़ैल गई वो 
छाया बनकर ....
पक्षी 
चहचहा उठे 
बूँदें 
थिरकने लगी 
पत्तियां 
जगमगाने लगी 
और, हवाएं 
महक उठी.. 
उस मीठी 
खुशबू से ....

इधर 
कई दिन से 
कुछ सेहतमंद लोग 
हो गए है 
जागरूक 
जब देखो ,तब 
उठा लेते है 
पत्थर 
ढांपने लगे है 
पैरों तले की 
जमीन .........

कौन समझाये 
????????

पक्के फर्श पर 
नहीं उगा करते 
पेड़......
और फैली जडें 
उखाड़ फैंकती है 
पत्थरों  को भी ..................

("काव्य-लहरी " में प्रकाशित )












मंगलवार, 15 नवंबर 2011

कुछ नज्में इमरोज़ के नाम ...........

बिक गया अमृता का मकान .......
 ये महज कोई कल्पना ,या मन बहलावा नहीं जिसे शब्दों में सराहा या नाकारा जाये ,ये एक ऐसी हकीकत है जिसका दर्द वही समझ सकता है जो अमृता को चाहता है,सिर्फ अमृता को ....उसके रुतबे ,उसके नाम ,उसकी साहित्यक पहचान से परे .....सिर्फ उसे ,उसकी रूह को ,उसके मन की उन दशाओ को,उस सत्यता को जिसे जीवन भर उसने जिया ... जिसने महसूस किया होगा उसे शब्दों का होश कहाँ .......यूँ लगा ....


........(1)............
मेरी आँख में पलता सपना टूट गया 
जैसे कोई अपना छूट गया,
 अब ढूँढने को दुनिया हो गई ,
मंदिर  में स्थापित मूर्त खो गई...
(30.8. 2011 )
 ~~~~~~~~~~~~~~*~~~~~~~~~~~~~~~*~~~~~~~~
साहित्य जगत में खलबली है ,सवालों की बारिशें  हैं , हर  नजर इमरोज़ की मोहब्बत पर सवाल करने को आतुर है..???????????.. पर इमरोज़ किससे साँझा करे..? और क्यूँ करे ?जब ये मकान घर बना ,सवाल तब भी उठे थे... दर्द तब भी मिला था,पर हौंसला था....आज मकान (घर नहीं)बिका तो फिर वही सवाल ...... 
आखिर क्यूँ......?????  इस क्यूँ का जवाब ,कभी किसी सवाल के पास नही होता ....हाँ इमरोज़ जी की मनोस्थिति के बारे में इतना ही कह सकती हूँ.... 

              (इमरोज़ .....)
(2)
एक झरना फूटा
चीर गया धरती का सीना 
ज़ख्म था गहरा 
कैसे दिखता 
कुछ पल में ही 
झील हुआ ...
 सुबह गुजारो 
शाम बिताओ, 
मिटटी डालो ,
कंकर फेंको ,
शब्दों का जितना,
जाल फैलाओ...
वक़्त गुजारेंगे, सब 
दिल बहलाएँगे, 
फटे हुए उस सीने को
मगर, कहाँ....
सिल पाएंगे ......
(10 नवम्बर 2011) 

~~~~~~~~~~~~~*~~~~~~~~~~~~~~*~~~~~~~~~~~~

(3)
 "नही बिका करते कभी घर
    बिका करते है मकान 
    तू है तो मै हूँ 
          मै हूँ तो ये जहान......".
          
~~~~~~~~~~~~*~~~~~~*~~~~~~~~~~

( 4 )
"घर रूह से होता है 
जिस्म होता है एक मकान 
मिटना लाजिम है जिस्म का 
फिर रूह क्यूँ कर हो परेशान" 

(11.11.2011 )


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बहुत बवाल उठ रहा है ,कई सवाल हो रहे है ,सब जागरूक हो रहे है, लेकिन ईंट गिरने के बाद ,धरोहर तो वो उस वक्त से था ,जब से अमृता इमरोज़ ने इसे बनाया ,उसके जीते जी किसी को ख्याल न आया ,उसके जाने के बाद भी ,5 साल 5 महीने  बीत गए कभी किसी ने ये कदम नही उठाया ...........आज जो ये हवा चली है ,ये पहले भी उस घर का पता जानती थी ,पहचानती थी उन साँसों की खुशबु को ,जर्रे  जर्रे  में समाई अमृता के वजूद के लफ़्ज़ों को ....फिर ये चेतना आज क्यूँ ..????
क्या इसलिए के आज वो मकान जमीन हो गया ...?  
ईंटे गिर गई तो साहित्य जगत पशेमां हो गया .....?
एक  बहुमूल्य निधि के खोने का एहसास हो गया ..........?
शायद
यही दुनियावी हकीकत है ......


जब जिस्म मिटटी हो जाते हैं तो उनके "नाम" का गुणगान होता है 
जब भूत पिशाच हो जाती है तो "रूह" का गुमान होता है, 
जब संपतियां लुट ,बिक  जाती हैं तो धरोहरों का ख्याल आता है,
जीता जागता इंसान सदा से  जग में अनजान होता है ...
~~~~~~~~~~*~~~~~~~~~~~~~


जब ईमान की ईंट से एक छत का निर्माण हुआ ,मकसद तब भी एक  "घर" था ,आज ईंटे बिकी ,तब भी मकसद, अमृता की जीती जागती रचनायें है ...और इमरोज़ का "सुच्चा मान"अमृता ही नही उससे जुडी हर शै है...जिसे वो अपनी आत्मा से चाहते है...बिल्कुल 
"राधा " की तरह 
बहुत कुछ है लिखने को ,भावों की एक नदी बह रही है ,प्रश्न है पर स्वयं से.....इस सांसारिक व्यवहार से ........
आज इतना ही ,कुछ पल पहले बात हुई इमरोज़ जी से उसका जिक्र फिर करूंगी .....

गुरुवार, 3 नवंबर 2011

राधा .....




राधा तो धारा है 

जो आज भी बहती है 

तेरे मेरे चितवन के ,

गहरे सागर में रहती है ......
                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                                        

शुक्रवार, 21 अक्तूबर 2011

तू जवाब बनी रह ,बस ..


कुछ दिन पहले इमरोज़ जी से जब मिली थी तो किसी से बात करते हुए वो घर का पता बदलने कि बात कह रहे थे ,पर मैं पलट कर सवाल नहीं कर पायी क्यूंकि अक्सर जब भी मिलती हूँ  सवाल कर ही नहीं पाती सिर्फ देखती ,सुनती रहती हूँ वो जो भी कहते हैं ,शायद इसलिए कि अमृता इमरोज़ एक ही दिखते है .पर एक सवाल भीतर ही भीतर कुलबुला रहा था ऐसी कौन सी वजह है जिसके चलते ये फैसला इमरोज़ जी ने लिया ,कौन  सी मजबूरी ..हालाँकि इस शब्द से वो कोसो दूर है ...फिर क्यूँ .......ये क्यूँ आज भी बरकरार है .......पर आज एक बार फिर दिल पर गहरा आघात हुआ "ये सच है " ये जानकर ...जैसे अमृता के जाने के वक्त हुआ था , वो दर्द कुछ कम हुआ था इमरोज़ से रूबरू होने के बाद ..
              ये अच्छा हुआ या बुरा ,उचित अनुचित ,पता नहीं पर मेरी आँख में पलता सपना टूट गया ,जैसे कोई अपना छूट गया, अब ढूँढने को दुनिया हो गई ,मंदिर  में स्थापित मूर्त खो गई....
सोच रही हूँ क्या इमरोज़ उस घर के बिना रह पाएंगे ,जहाँ आज भी अमृता बोलती रही है उनके अकेलेपन में ,हंसती, खिलखिलाती,गुनगुनाती,इशारों में बतियाती हर पल हर लम्हा साथ साथ चलती रही है  ,इस सबके साक्षात गवाह इमरोज़ स्वयं है उनका चेहरा ,उनकी आँखे जो,अमृता के चाहने वालों की भीड़ में...अमृता की बात करते करते बरबस उस प्रेम से भीग जाती है, ये जाने कितनी बार ,बार बार ,हर बार होता रहा है .....होता रहेगा....

                         फिर ये सवाल जेहन को क्यूँ भ्रमित कर रहा है..एक  ईंट गारे का घर ,दूसरा जीवंत ,सांस लेता घर जहाँ भी होगा अमृता वहीँ होगी ....निशानियाँ मरने वालों की संभाली जाती है ,जो जीवित हैं उनका जीवन प्रेरणा की अमिट निशानी है  .....सोचा...! सोचा...!समझा ...तो मन भीग गया उस सत्यता की रौशनी से ......
जिसने  मनचाही जिंदगी जी ... खामोश मौत को चुना.. जो सारे कर्मकांडो को तोडकर ,मिटटी के बिछोने पर,मनचाही चादर ओढ़ कर ,मिटटी में बीज सी घुल  गई ...वो अनश्वर ,नश्वरता को कैसे तरजीह दे ....जीवन जीना अनश्वर की और ले जा है,तो जीवन बिताना नश्वरता से जोड़ कर बन्धनों में बांधता है ....जो उसे जकड नही पाए और इमरोज़ जी को पकड़ नहीं पाए .....कुछ न कह कर भी बहुत कुछ कह जाते हैं इमरोज़ ,कहने पे आयें तो यूँ ...जैसे सूरज का रोज़ निकलना और फिर छुप जाना.....
                   सवाल कभी नहीं किया ,और करूं तो कैसे ...."अमृता इमरोज़ के ख़त " का अंग्रेजी अनुवाद पुस्तक के विमोचन पर इमरोज़ जी से मिली ,बहुत सी बातें हुई ...इमरोज़ जी को कार्यक्रम के फ़ौरन बाद वापस जाना था इस अचानक के पीछे की वजह भी निश्छल ,बिलकुल उनके जैसी ..हालाँकि अगले दिन एक और विमोचन उन्हें करना था जिसके लिए ख़ास वो चंडीगढ़ आये थे ....पर इंसानियत ...मुंबई से कोई आम सा इंसान ,मेरे जैसा,अमृता जी का पाठक उनके घर आ रहा था ,और दोनों प्रोग्राम एक ही दिन हो गए ,अपनी गलती को स्वीकार भी किया ...दो अखबारों में खबर  या रचना छपते ही बड़े ,और दो किताबें आते ही बड़े लेखक का तगमा टंग जाता है नाम के साथ ,पर इतनी ऊंचाई पर भी वो इंसान इतना सरल, इतना सहज .....
                   खैर ये वाकया अकेला नहीं....जब भी मिलती हूँ  , हर बार बहुत कुछ ऐसा मिलता है मुझे .....
बात सवाल की थी ,उस दिन जब इमरोज़ जी जाने लगे -क्यूंकि ज्यादा बात नहीं हो पाई थी ,कुछ कहने लगी .......पर रोक दिया वहीँ .............बोले " तू जवाब बनी रह ,बस ......"......शायद उन्हें लगा कि मैं कोई सवाल करने वाली हूँ उस भीड़ की तरह.................नहीं ,  पर एक ? की तरह ये बात कई दिन ,शायद आज भी मेरे सामने है ....नहीं पूछ पाई ऐसा क्यूँ कहा ....किसलिए कहा ...जो कहा सादर सा उतर गया भीतर .....और अब इसके बाद तो कोई गुंजाईश ही नहीं सवाल की .....
बहुत सी बातें हैं ,मुलाकातें है ....कभी शब्दों में पिरो लेती हूँ ,कभी बादल सी रो लेती हूँ ,और कभी रूह को भिगो लेती हूँ ........................कुछ बातें अगली पोस्ट पर सांझा करूंगी ....इस बात को लिखे भी महीने हो गए ....पर ब्लॉग पे आज पोस्ट कर रही हूँ ,बस यूँ ही आज बैठे- बैठे मन हुआ कुछ अमृता की बात की जाये तो ...कह दिया ,
कुछ अमृता को समर्पित कवितायेँ अगले सप्ताह पोस्ट करूंगी ....दिवाली के बाद ....शुभकामनाएं  



 आप सभी को दीपावली की हार्दिक मंगल कामनाएं 

गुरुवार, 13 अक्तूबर 2011

कान्हा..! ले चल ......!....



अधूरी प्यास 
अधूरा अहसास 
मिलन का 
क्षणिक आभास......
बढ़ जाये प्यास 
बिखर जाये 
एहसास 
फ़ैल जाये 
आभास 
हो जाये
 बरसात 
भीग जाएँ
 जज़बात
रास हो जाये
 महारास ......
न आर न पार 
हो जाये एक सार.....
कान्हा..!
ले चल
उस द्वार .......
ले चल ....., उस द्वार ....!



सोमवार, 10 अक्तूबर 2011

ग़ज़ल गायक "जगजीत सिंह"



एक आवाज़ ,एक सुकून,समंदर की वो लहर जो अक्सर खोये खोये दिलों को भिगो कर कहीं दूर गहराईओं में ले जाती थी ,और शांत अहसास में डूब जाते थे वो भीगे मन ,आज वो आवाज़ शांत ,खामोश हो गई .......
पर कहने को ,क्यूंकि ऐसी रूहानी शक्तियां शरीर से भले दिखाई न दें ...पर हमेशा हमारे आस पास मोजूद रहती है क्यूंकि  कला मरती नहीं ....
"एक मुसाफिर है ,सफर  है सबकी दुनिया 
कोई जल्दी में कोई देर से जाने वाला "(HOPE..SINGER JAGJIT SINGH) 
ये कमी तो रहेगी .....कलाकार समाज ,देश को जो देता है उसे महफूज़ रखकर ,उसके होने को बरकरार रखा जा सकता है ...यही सच्ची  श्रद्धांजलि  है एक कलाकार के लिए  .....
उन्ही की गाई एक ग़ज़ल के चंद अशआर.....

मंजिल न दे चराग न दे ,हौंसला तो दे 
तिनके का ही सही तू आसरा तो दे ...
मैंने ये कब कहा ,कि मेरे हक में हो जवाब 
लेकिन खामोश क्यूँ है ,कोई फैसला तो दे 
बरसों मैं तेरे नाम पे खाता रहा फरेब 
मेरे खुदा कहाँ है तू ....अपना पता तो दे ........
मेरे खुदा कहाँ है तू ....अपना पता तो दे ........

और आज वो पता उन्हें मिल गया ..........
वही सुकून जो इस दुनिया ,हमारे मन को उन्होंने अपनी गायकी से दिया ,वही उनकी रूह को खुदा प्रदान करे ...
उनके सफर को परवान करे .....यही प्रार्थना  करते हैं .......

(हार्दिक  समर्पित....)
"दर्द ही उसका हमदम रहा 
सुरों से सहलाता जख्म रहा 
खोने पाने की भीड़ के घेरे में 
ताल मिलाता वो हर कदम रहा ....." 



रविवार, 9 अक्तूबर 2011

बीज वट का

बीज 
नहीं बोया जाता 
किसी हाथ से 
उगता  है स्वयं 
स्वयं के प्रयास से ......
अंतस में 
पनपता 
बरसात में
निखरता 
सुनहरी किरणों से 
चमकता 
कब हो जाता है 
'वट'  .......
पता ही नहीं चलता 

मंगलवार, 27 सितंबर 2011

तुम.....

तुम झूठ  पे झूठ कहते रहे

मैं यकीं पे यकीं चिनती रही ....

मेरे यकीं के पुल के नीचे से 

तेरे झूठ की नदी बहती रही ... 

सोमवार, 19 सितंबर 2011

क्या कहूँ ... मैं ... उसे....! ! !.

मुखिया के लिए 
    प्रार्थना 
बच्चों के लिए 
   कामना 
जोड़ कर
दोनों हाथ 
खड़ी रहती है 
सुबह ,शाम .....

दिन ,महीने ,बरस 
जाते हैं गुज़र 
बीत जाती है 
 उम्र 
हो जाती है 
पत्थर .......

न नींव में 
जुड़ता 
न कंगूरे का 
हिस्सा 
बनती है 
बस_ _ _
दहलीज़ का 
किस्सा .......

तकती है 
राह 
नहीं कोई 
गवाह 
करती है 
निबाह 
नहीं भरती 
वो आह .....

पत्नी ,
माँ के नाम से 
होती है 
दर्ज़ 
निभाती है 
फ़र्ज़ 


क्या कहूँ...! !
मैं उसे 
आती है चुकाने 
वो तो 
कई ........
जन्मों के 
क़र्ज़ ........    

सोमवार, 12 सितंबर 2011

चिंता ....?????

दीवार में 
उग आये 
पेड़ का 
विरोध ....? ? 
चिन्ता 
पेड़ के पनपने 
और 
जगह के अभाव की नहीं 
फैली जड़ों से 
खुद की 
दीवारों के 
ढह जाने की थी ...
(" काव्य-लहरी " में प्रकाशित )

बुधवार, 31 अगस्त 2011

समं दर का सूरज

अमृता के जन्म दिन पर अमृता के लिए 


समं दर का सूरज 


तीन बार 
किनारों ने 
सिर उठाया 
तीनों बार 
उनके वजूद को 
चूर होते पाया ...
इसलिए 
छोड़ 
किनारों को पीछे 
नदी के बहाव को 
लगाया गले ....
पर 
जानती हो ...
किनारे 
छूटते कहाँ है..!
चलते हैं वो तो 
साथ ही 
या 
घुल जाते है 
लहरों के आवेग से .....
आज 'तुम' 
समंदर हो 
और तुम्हारे 
माथे पर 
चमकता सूरज 
कोई और नहीं 
तुम्हारे 
घुले हुए किनारे है........ 

शनिवार, 27 अगस्त 2011

एहसास




हर बात से डर लगता है 
हर बात पे सहम जाते है 

जब झूठ के मेले में, एहसास 
बच्चे से कहीं खो जाते हैं .......

गुरुवार, 18 अगस्त 2011

रिश्ते

रिश्ते 

नहीं होते

 मोहताज़ 

वक्त के... 

जो होते है 

वो रिश्ते नहीं

होते हैं

 महज़

टाइम पास.....

इश्क ...



उसने कहा ,

"मुझे मोहब्बत है "

मैंने पूछा

' इश्क '

क्यूँ नहीं ..???

उसने कहा   

मोहब्बत

' हवा ' है

और 

इश्क

' बरसात '



रविवार, 7 अगस्त 2011

दोस्त

दोस्त 
दो सत 
जैसे सूरज 
जैसे सागर 
तभी तो 

होता है विरक्त ...
रज से 
तम से 
बंधता है सम 
सिर्फ 
सत से ......

सोमवार, 25 जुलाई 2011

भाव



भाव बिन

        सूनी भक्ति.....

प्रेम बिन

   सूना जीवन .....

बिन मन
        
       निभे न रिश्ते...... ,
दिखते जैसे
लिबास और तन.....

सोमवार, 11 जुलाई 2011

शुक्रवार, 8 जुलाई 2011

                                              


बहुत मायूस है वो कि मुझमें वफ़ा तो नही ,

 उसे जरुरत थी मेरी ,कभी कहा भी तो नही.........

.

गुरुवार, 7 जुलाई 2011

बुधवार, 8 जून 2011

अंतर

अंतर है 
मंदिर के पत्थर 
और 
रास्ते के पत्थर 
 में 
इतना ही 
एक पर 
विश्वास किया 
तुमने ...
और 
दूसरे ने 
तुम पर .......

शुक्रवार, 3 जून 2011

औरत

रचना से 
रचित का 
  सफ़र 
तय करती है 
बड़ी ही 
तन्मयता से ,
प्रेम से ,
समर्पण से ....
पर ,मंजिल 
नहीं आती 
कभी हाथ ,
आती है 
तो 
छूट जाती है 
सफ़र की 
दीवानगी में .....! 

मंगलवार, 31 मई 2011

आधार

प्रेम से


देखा


तो हो गया


निर्विकार .....!! ! !


ज़रा सी


अनदेखी


और फैलता


कितना


विकार.......??? ? ? ?

सफ़र

कभी कभी
यूँ
चली आती है
जैसे हवा,
जैसे किरण
या फैंक दे
कोई
ठहरे हुए
पानी में
कंकर ....
बहुत
जानलेवा
होता है ये
भंवर ~~~~
फिर भी
कहाँ
रुकता है
याद का
सफ़र.........

मंगलवार, 17 मई 2011

सुर और ताल

वेद'
बन गए वाद
'शास्त्र'
बन गए शस्त्र
और ‘गीता’
रह गई बन कर गीत
'कौन हैं' जो
सुर पहचाने
'कौन है' जो
ताल मिलाए
बैठे हैं सब के सब
जाल बिछाए......

सोमवार, 28 मार्च 2011

वो जब .........

वो जब पास नहीं होता बहुत ही पास होता है
जुदाई का ये रंग बहुत ही खास होता है ...

न बंदिश न रवायतें ,न शिकवा-शिकायतें
रूह-ऐ-पाकीज़गीका खूबसूरत अहसास होता है ...

पलकों के आसमान पर चमकते है सितारे ,
लरज़ते होठों पर भीगता इक मलाल होता है...

रगों में घुलता है कोई रंग खुशबू बनकर ,
ख़ामोशियों का न फिर कोई सवाल होता है ...

रविवार, 6 मार्च 2011

दहलीज़


उसके
घर तक पहुँचना
बहुत
आसान है
पर..
इतना भी नहीं
क्यूंकि ,
उसके
घर के बाहर
कोई
दहलीज़ ही नहीं ..!!!

शनिवार, 5 मार्च 2011

अमृता



नदी बन कर
बहती रही~~~~~~
अपने ही किनारों
को लिया खोर
इस बहाव में..........और
बन गई
अथाह समन्दर-
जहॉ, ना किनारे हैं
ना नदी,
है तो
बस विस्तृत
फैला अस्तित्व..
गहराई में जिसकी
छिपे हैं खज़ाने
तुम्हारे अनमोल
अस्तित्व के...