रविवार, 27 नवंबर 2011

बीज और जड़


बीज 
जब बोया 
था एक भाव ...
अंकुरित ,
पल्लवित ,और फिर 
हो गया 
फलीभूत 
एक सुंदर 
रचना में ....
निहारा 
संवारा 
फ़ैल गई वो 
छाया बनकर ....
पक्षी 
चहचहा उठे 
बूँदें 
थिरकने लगी 
पत्तियां 
जगमगाने लगी 
और, हवाएं 
महक उठी.. 
उस मीठी 
खुशबू से ....

इधर 
कई दिन से 
कुछ सेहतमंद लोग 
हो गए है 
जागरूक 
जब देखो ,तब 
उठा लेते है 
पत्थर 
ढांपने लगे है 
पैरों तले की 
जमीन .........

कौन समझाये 
????????

पक्के फर्श पर 
नहीं उगा करते 
पेड़......
और फैली जडें 
उखाड़ फैंकती है 
पत्थरों  को भी ..................

("काव्य-लहरी " में प्रकाशित )












गुरुवार, 3 नवंबर 2011

राधा .....




राधा तो धारा है 

जो आज भी बहती है 

तेरे मेरे चितवन के ,

गहरे सागर में रहती है ......