गुरुवार, 19 जनवरी 2012

अन्तर..............

अन्तर है......
मंदिर के पत्थर


और
रास्ते के पत्थर में
 इतना ही .....

एक पे विश्वास
किया तुमनेऔर
दूसरे ने


तुम पर .........

( "काव्य-चेतना "में प्रकाशित )

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

सुर और ताल .......


वेद
बन गए वाद.....
शास्त्र
बन गए शस्त्र...
और ‘गीता’ 
रह गई , 
बन कर गीत....





कौन हैं ‘जो
सुर पहचाने
कौन है 'जो'
ताल मिलाए
बैठे हैं , सब के सब
जाल बिछाए..........!!!!!



(....'काव्यांजलि' से ....)
 (काव्य संग्रह...चंडीगढ़ साहित्य अकादेमी)