शनिवार, 30 जून 2012

फलसफ़ा .............!!!!!!!! (१)

डूबने की बात  
करते हैं अक्सर 
तैरने वाले .... !

लहरों के साथ 
जो रहते हैं खेलते ,
मोड लेते हैं रुख 
चट्टानों के आने पर ..
छोड़ देते है उन्हें 
टूट कर 
बिखरने के लिए ...!!

लेते हैं तलाश 
फिर से ,
कोई नई लहर ...
ले जाती है जो उन्हें  
कुछ और दूर ...

यूँ नाप लेते हैं 
वो समंदर को ...
और अंतत :
जीत लेते हैं बाज़ी .....!!!

देखते हैं मुस्कुराकर 
समंदर की ख़ामोशी को ...
पर ,क्या  मालूम उन्हें 
नापने की कोशिश में 
हार गए , वो खज़ाना 
जो छुपा था 
समंदर  की  गहराई में .....!!!! 
( "काव्य-चेतना "में प्रकाशित )

रविवार, 24 जून 2012

रिश्ता ..............

आदमी को 
चाहिए थी औरत 
औरत को एक रिश्ता ....
दोनों के बीच था 
गहरा समंदर ....
न वो आर हुए ....
न पार ....
बस  बंधे रहे 
डोर के दो सिरों से .........
( "काव्य-लहरी " में प्रकाशित )