बुधवार, 19 जून 2013

सत्य -सेतु


न्याय और सत्य पथ पर 
राम, तूने एक सेतु बनाया 
विशालता के अहं को उसपे 
नतमस्तक होना सिखाया ...

तुम्हारी सच्चाई पर उसने 
रास्ता था तुम्हें दिखाया 
चरणों को तेरे छूकर 
लहरों ने मर्यादा को निभाया .....

भक्ति और समर्पण को 
हवा ने गले से यूँ लगाया 
तेरे नाम की लय पर 
पत्थर को तैरते पाया .....

तेरे रूप की मोहकता 
जल निहार रहा था मूक 
तुम ही तुम थे सब जगह 
जरा नही थी चूक .......

पर देखो फिर से 
उठी है एक बयार 
विकास की लय पर 
एक सेतु बने आर पार .......

आगे बढने की प्रभु 
लगी ये कैसी होड़ 
जाना कहाँ ,मालूम नही 
फिर भी लगी है दौड ........


कोई जाये जाकर देखे सागर 
चीख चीख कर करे पुकार 
मत बांधों मुझे ,बहने दो 
ना खड़ी करो तुम दीवार ...

कहीं सरहदें ...कहीं दीवार 
कहीं जाति, कहीं धर्म विवाद 
तेरी नैसर्गिकता से प्रभु ..
बुद्धि  करती क्यूँ है छेड़छाड़ .....

एक दिन ऐसा आएगा ..
सुन लो प्रभु का नाद 
यही उच्छृंखलता कभी तुम्हें 
हे मानव, कर देगी बर्बाद ....



बाहर से तुम खूब फले हो 
अन्तर में बसता खालीपन ..
झाँक लो भीतर एक बार तुम ...
विकसित हो जाएगा तन मन ........
.................................................
 { अंजू अनन्या }

{ "काव्य-चेतना " से }


शुक्रवार, 7 जून 2013

दृष्टिभ्रम.................


खुदको
साबित करने की चाह
अंतत :
साबित होकर भी
दब जाती है
मुठी  भर
मिट्टी के नीचे .....

फरोला  जाता है
जिसे
बार -त्यौहार
या फिर
कभी लभी
तलाशते हैं
मिट्टी से
जुड़े लोग ही
मिट्टी में
रूह का अस्तित्व  ......

गाहे बगाहे जो
दे जाता है
एहसास  
उनके होने का

पर विचारणीय है ...??!!

मुठ्ठी भर मिट्टी
रहती है कब तक .?

मौसमों में
बिखरती
घुलती
बहती ...
अंतत : हो जाती
ज़र्रा...

छोड़ देती हैं
ज़मीन
बन जाती है
 आसमां

रह जाता है
दृष्टिभ्रम ...........!
(" काव्य-लहरी " में प्रकाशित )