बुधवार, 3 जुलाई 2013

संधि बेला .............


बुझने से पहले
अकसर  
हो जाती है तेज़ ,
दीये की टिमटिमाती लौ......
शायद
कुछ ऐसी ही होती है
पुराने और नए वर्ष की
संधि् बेला ................
जहाँबीता वर्ष
करता है आकलन
तीन सौ चौसंठ दिनों का
औरजोड घटाव के बाद
कर लेना चाहता है दर्ज
अंतिम दिन........
बन जाए जो ‘अर्थ
पूरे वर्ष का 
या फिर 
करता है कोशिश
संवारने की ,
पुराने लिबास को ....
और फिर ,
सपनीले धागों 
आशाओं के रंग से
बुनता है 
एक ‘नया लिबास
जो बेहतर हो
पुराने लिबास से .....
पर ,क्या 
ऐसा होता है...?
ये सवाल
हर साल
इसी संधि् बेला पर
बन जाता है
प्रश्न चिन्ह’ 
और मैं
खोजने लगती हूँ 
उसका हल........