सागर मंथन
देवदानव
पिफर समुन्द्र की निध्यिों का
बँटवारा ............
सब कुछ बराबर बराबर
पर अमृत कलश को
देखते ही
उठा विवाद
अमृत’ की चाहत में ---
सेतु समुन्द्रम
देव रूपी आस्था
बैठी है चुपचाप
सत्ता की लोलुपता
कर रही है छीना-झपटी
अमृत कलश का
हो गया बटवारा
कलश बन गया ‘राम सेतु
पर अमृत ‘राम’ नही
ब्लकि है
सत्ता की महत्वाकंक्षा
विवाद वही ‘अमृत’ का ----
जहाँ जहाँ अमृत गिरा
वहाँ वहाँ कुम्भ बना ----
जहाँ जहाँ कलश छलकेगा
वहाँ वहाँ कुर्सी का वर्चस्व बनेगा
ऐसा माना जा रहा है
राजनीति के अर्थों में ---
जब जब कुम्भ आता है
धर्मिक संवेदना
खिंचती है,
नदियों की ओर
जब जब चुनाव आता है
अपने वर्चस्व हेतु
सत्ता उठाती है
राम’ का तूणीर और
साध् लेती है
कोई ना कोई निशाना ण्ण्
किन्तु,
तीर चलाने वाले हाथ
नहीं जानते
कि तूणीर चाहे राम का रहा हो
पर तीर ‘राम’ के नहीं
क्योंकि
सत्ता विमुख तूणीर भी
अब हो गया है खाली
और आस्था,
हो गई है समझदार
जान गई है भेद
लक्ष्य और निशाने का
सत्ता सेतु और
सेतु समुन्द्रम के बीच काण्ण्
जू
हम थेहम हैंहम होंगे
या पिफर लेंगे जन्म
ऐसा मानते है हम
शास्त्राों से सुनकर ण्
तो राम थे,
राम हैंऔर पिफर
वो भी होंगे
इसी लोक में
ऐसा क्यूँ नहीं मानते
क्यूँ उछालते हैं किसी बात को,
क्यूँ जोड़ते है भावनाओं से,
क्यूँ तलाशते हैं सबूत
उन सबके वजूद का
---
जबकि हमआज तक
नहीं तलाश पाए,
अपना ही वजूद
इस ब्रमाण्ड में
भोली आस्था की नींव पर
क्यूँ बनाते हैं दीवारें
कभी जन्मभूमि तो
कभी राम सेतु के नाम पर,
जबकि अपने ही घर में
अपने ही पालने वालों की
हर निशानी कोबहा देते हैं
गंगा में
या पफेंक देते हैंबेकार समझकर
तसल्ली के ​लिए,
कहते हैं खुद सेकि ‘वो
हमेशा हमारे साथ है
क्योंकि
हम ‘‘उन्हीं’’ का अंश है
तो पिफर ‘वो
जो सबका है
सब ‘जिसके’ अंश हैण्ण्
क्यूँ रख दिया है उसे
अलग थलग
एक अंध्ेरे कोने में,ण्और
उसकी महत्ता के लिए
पूजते हैं उसकी निर्जीव
निशानियों को,
जबकि बहा देते हैं लहू
उसी के सजीव अंशों का
किसी ना किसी
धर्मिक संवेदना की
आड़ में,
अपने निहित स्वार्थों की
पूर्ति हेतु 
सुर
ताल
वेद
बन गए वाद
शास्त्रा
बन गए शस्त्रा
और ‘गीता
रह गई बन कर गीत
कौन हैं ‘जो
सुर पहचाने
कौन है जो
ताल मिलाए
बैठे हैं सब के सब
जाल बिछाए
बात बनाने में
जितने माहिर हैं
हैंउतने ही माहिर
पुलों को बनाने को बनाने मेंण्ण्
पुल का निर्माण
किया जाए कैसे
ये तो आता है,
हर ईंट में दृश्य
नए पुल का
नजर आता है ण्
राम’ की डिग्री की
पड़ताल तो कर लेना,
पर पहले/अपने निर्माणों का
ब्यौरा रख लेना ण्
उसके सेतु का
प्रत्येक कंकड़ भी
था विश्वस्त .....,लेकिन
तुम्हारे सेतु की
कल्पना मात्रा से
सागर भी है आशंकित ण्
मत जोडो तुम
अपने सेतु को
उसके पुल सेण्
समुद्री तूपफानों के बीच
बरकरार है वो
आज भी ्र
जन मानस के दय में
बनकर
श्र(विश्वास
जबकि,
तुम्हारे बनाए पुल
आए साल
बह जाते हैं
बरसातों मेंण्
और रह जाते हैं
एक भयावह
दृश्य से
जन मन मेंण्
प्रेरणा .............
हॉसुधि् में बसी
वो मौन अनुभूति
जो ले जाती है
तेज हवा के झोंके सी
नदी के बहाव को
समन्दर की ओर ...........
जहाँचाहने पर भी बहुत
नहीं जा पाते,
हम अकसर
हाँयही है
वो अहसासजो
बन जाता है कारण
स्वयं हमें, ‘हम’ से
मिलने का
वर्ना ............
कहाँ पहुँच पाते हैं
हमस्वयं के
अहसास तक ..................
संधि् बेला ........
बुझने से पहले
अकसर हो जाती है तेज
दीये की टिमटिमाती लौ......
शायद
कुछ ऐसी ही होती है
पुराने और नए वर्ष की
संधि् बेला ................
जहाँबीता वर्ष
करता है आकलन
तीन सौ चौसंठ दिनों का
औरजोड घटाव के बाद
कर लेना चाहता है दर्ज
अंतिम दिन........
बन जाए जो ‘अर्थ
पूरे वर्ष का 
या पिफर
करता है कोशिश
संवारने की ...........
पुराने लिबास को 
और पिफर,
सपनीले ागों
आशाओं के रंग से
बुनता है एक ‘नया लिबास
जो बेहतर हो
पुराने लिबास से .....
पर ‘‘क्या ऐसा होता है’’ घ्
ये सवाल
हर साल
इसी संधि् बेला पर
बन जाता है
प्रश्न चिन्ह’ घ्
और मैं
खोजने लगती हूॅ
उसका हल
अमृता
नदी बनकर
बहती रही
अपने ही किनारों
को लिया खोर
इस बहाव में..........और
बन गई
अथाह समन्दर
जहॉना किनारे हैं
ना नदीहै तो
बस विस्तृत
पफैला अस्तित्व
गहराई में जिसकी
छिपे हैं खज़ाने
तुम्हारे अनमोल
अस्तित्व के
क्षणिका
प्यार
एक शब्द
जिसके अर्थ को ‘कुछ
स्वतंत्रा हाथों ने
इतना उपर उछाला
कि
लटक गया है
ध्रती और आकाश
के बीच,
ना जमीं ही
पकड़ पा रही है उसे
और नाआसमान ही
झुकना जानता है.........................
क्षणिकाएं-
वि अन्तर है
मंदिर के पत्थर
श् और
रास्ते के पतथर में
वा इतना ही .....
एक पे विश्वास
श् किया तुमनेऔर
दूसरे ने
तुम पर 
परिवर्तन.......
अर्थ
कहीं खो गये
या कहूॅ कि .....
बाजार की चकाचौंध् में
दिखते है
जुगनू जैसे........
बचे हैं तो शब्द
वो भी बिकते हैं
आजकलबडे़ बड़े
बैनरों की ओट में
पहने जाते हैं
कीमती लिबासों के रूप में
जो बदलते रहते हैं
मौसमजगह
और
परिवेश के अनुसारण्ण्
जिंदगी
उसने कहा
जिंदगी क्या है घ्
एक खूबसूरत गीत
या कोई हसीन ख्वाब ..... 
मैंने कहा
गीत या ख्वाब
तो नहीं पतापर हॉ
जीने के लिये
जरूरी है
कुत्ते सी वपफादारी
क्योंकिजरा सी ‘चूक
बना देगी ‘लावारिस
इतना ही नहीं
घोषित कर दिऐ जाओगे
हलकाए’ हुए
और मार दिए जाओगे
बेमौत
मीठी रोटी में
मिलाकर जहर
तबजिंदगी के मायने
चढ़ जाएगे बलि
म्यूनसपैलिटी’ वालों के
जनसुरक्षा
अभियान के तहत.....
सेतु
तब
न्याय और सत्य पथ पर
राम तूने सेतु एक बनाया 
विश्शालता के अहं को
उसपेनतमस्तक होना सिखाया ;1द्ध
तुम्हारी सच्चाई पर उसने
रास्ता था तुम्हे दिखाया 
चरणों को तेरे छूकर
लहरों ने मर्यादा को निभाया ;2द्ध
भक्ति और सम्पर्ण को
हवा ने गले से यूँ लगाया 
तेरे नाम की लय पर
हर पत्थर को तैरते पाया ;3द्ध
तेरे रूप की मोहकता
जल निहार रहा था मूक 
तुम ही तुम थे हर जगह
जरा नहीं थी चूक ;4द्ध
अब
पर देखोंपिफर से
उठी है एक बयार 
विकास की लय पर
एक सेतु बने आर-पार ;5द्ध
आगे बढ़ने की प्रभु
लगी ये कैसी होड़ 
जाना कहाँमालूम नहीं
पिफर भी लगी है दौड़ ;6द्ध
कोई जाए जाकर देखेसागर
चीरव चीरव कर करे पुकार 
मत बाँधे मुझेबहने दो
ना खड़ी करो तुम दीवार ;7द्ध
कहीं सरहदे कहीं दीवार
कहीं जाति कहीं ध्‍​र्म विवाद 
तेरी नैसर्गिकता से प्रभु
बुिकरती क्यूँ है छेड़छाड़ ;8द्ध
एक दिन ऐसा आएगा
सुन लो प्रभु का नाद 
यही उच्छृंखलता कभी तुम्हें
हे मानव कर देगी बर्बाद ;9द्ध
बाहर से तुम खूब पफले हो
अन्तर में बसता खालीपन 
झांक लो भीतर एक बार तुम 
विकसित हो जाएगा तन मन ;10द्ध
जिं उसने पूछा
दं जिंदगी क्या है घ्
गी घ् घ् घ्
 मैंने कहा
 पागल हो क्या घ्
 ये सवाल
 वो भी औरत से !!
 क्या तुमने कभी
किसी औरत को
जीते हुए देखा है