शनिवार, 18 अगस्त 2012

परवाह

अचानक
एक तेज़ रफ्तार
गाड़ी ...
कुचल गई
राहगीर को .......

भीड़
इकट्ठा हुई और
गिने जाने लगे दोष ...
और होने लगी
तहकीकात
दोषी की .....

भीड़ में ही
मौजूद था कोई
कवि ....
लिख डाली तुरंत
एक मार्मिक कविता
...............

अगले दिन
दोनों सुर्ख़ियों में थे ....

एक मार्मिक भाव की
नई  रचना के लिए ....

और दूसरा
'सडक हादसे ने 
ले ली एक और जान ......!!!!

और यूँ ....
रचनायें जन्मती हैं 
मरती
है .......
जड़  और चेतन की परवाह
कौन करे ......???



शनिवार, 30 जून 2012

फलसफ़ा .............!!!!!!!! (१)

डूबने की बात  
करते हैं अक्सर 
तैरने वाले .... !

लहरों के साथ 
जो रहते हैं खेलते ,
मोड लेते हैं रुख 
चट्टानों के आने पर ..
छोड़ देते है उन्हें 
टूट कर 
बिखरने के लिए ...!!

लेते हैं तलाश 
फिर से ,
कोई नई लहर ...
ले जाती है जो उन्हें  
कुछ और दूर ...

यूँ नाप लेते हैं 
वो समंदर को ...
और अंतत :
जीत लेते हैं बाज़ी .....!!!

देखते हैं मुस्कुराकर 
समंदर की ख़ामोशी को ...
पर ,क्या  मालूम उन्हें 
नापने की कोशिश में 
हार गए , वो खज़ाना 
जो छुपा था 
समंदर  की  गहराई में .....!!!! 
( "काव्य-चेतना "में प्रकाशित )

रविवार, 24 जून 2012

रिश्ता ..............

आदमी को 
चाहिए थी औरत 
औरत को एक रिश्ता ....
दोनों के बीच था 
गहरा समंदर ....
न वो आर हुए ....
न पार ....
बस  बंधे रहे 
डोर के दो सिरों से .........
( "काव्य-लहरी " में प्रकाशित )

बुधवार, 16 मई 2012

चाहत ............!!

चाहते हो पालना  
मन के आँगन में 
कुछ  भी  ऐसा  ,
जो  कम  कर दे  
सूनापन ....!

पालना ये सोच कि 
चाहते हो तुम  
किसी को ...
महका देगी ये 
आँगन को 
बेला के फूल सा ......!!

कोई चाहता था 
चाहता है ..या  
चाहेगा तुम्हे...
मत बीजना  
कभी ये भरम  
सूने आंगन में ....!!!

फ़ैल जायेगा ये  
खरपतवार की तरह 
छोड़ जायेगा तुम्हें 
तब, आँगन का 
सूनापन भी.....!!!!

और यही नही ,
खो जायेगी उसकी  
सहज , सरल 
विशालता ................

(अनन्या अंजू )
 ( "काव्य-चेतना "में प्रकाशित )

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

जिंदगी......(2)



 उसने पूछा
 जिंदगी क्या है.....?
 मैंने कहा, 
 पागल हो क्या...!
 ये सवाल
वो भी औरत से !!
क्या तुमने , कभी
किसी औरत को
जीते हुए देखा है ........!!
(अंजू अनन्या )

( "काव्यांजलि " में प्रकाशित )


शनिवार, 7 अप्रैल 2012

जिंदगी......


उसने कहा.........
जिंदगी क्या है 
एक खूबसूरत गीत
या कोई हसीन ख्वाब ..... 
मैंने कहा
गीत या ख्वाब
तो नहीं पतापर हॉ
जीने के लिये
जरूरी है
कुत्ते सी वफादारी
क्योंकिजरा सी ‘चूक
बना देगी ‘लावारिस
इतना ही नहीं
घोषित कर दिऐ जाओगे
हलकाए’ हुए
और मार दिए जाओगे
बेमौत
मीठी रोटी में
मिलाकर जहर
तबजिंदगी के मायने
चढ़ जाएगे बलि
म्यूनसपैलिटी’ वालों के
जनसुरक्षा
अभियान के तहत.....!!

( "काव्यांजलि " में प्रकाशित )

सोमवार, 20 फ़रवरी 2012

दृष्टिकोण .....

शिवरात्रि के रोज़
पत्तों और
कच्चे फलों से
विरक्त कर दिया गया
'बेल 'का पेड़ .....!

श्रद्धा ,अभिव्यक्ति का
ये रूप 
मुझे गया 
झकझोर ....

क्यूंकि ,
एक स्पर्श के बाद
पत्तों ,फलों की 
जगह थी
कचरे का डिब्बा ...!!

सोच रही हूँ .....
समय से पहले
ये मृत्यु है
जीवन की ,
या फिर
मुक्ति का
कोई सिलसिला ....!

धारणाओं ,मान्यताओं
की भूमि पर ,
जीवंत हो गया
 दृष्टिकोण ....
अन्त:करण पुकार उठा ....

जीवन जीवन होता है .....
भिन्न होता है तो
दृष्टिकोण .....
जो देता है मायने
जीवन को ........!!

(ये दृश्य मनगढंत नहीं ...हकीकत है ...)
("काव्य चेतना " से  ..)
संपादक :डॉ. धर्म स्वरुप गुप्त 
वर्ष :2009

रविवार, 19 फ़रवरी 2012

कल शिवरात्रि .......
आप क्या अर्पित करने वाले हैं बाबा को .......
दूध ...
जल ...
बिल्व पत्र...
बिल्व फल (कच्चा)
फूल ...
भांग ....
धतूरा ......
या सब कुछ ....
या कुछ भी नहीं .....
जो भी अर्पित करेंगे उसके पीछे  क्या
वजह है .....धारणा है....
अपने विचार रखे .....सादर!

मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

प्यार’.......





प्यार
एक शब्द
जिसके अर्थ को ‘कुछ
स्वतंत्र हाथों ने
इतना उपर उछाला
कि
लटक गया है
धरती और आकाश 
के बीच,
ना जमीं ही
पकड़ पा रही है उसे
और नाआसमान ही
झुकना जानता है...

( "काव्य-चेतना "में प्रकाशित )

गुरुवार, 19 जनवरी 2012

अन्तर..............

अन्तर है......
मंदिर के पत्थर


और
रास्ते के पत्थर में
 इतना ही .....

एक पे विश्वास
किया तुमनेऔर
दूसरे ने


तुम पर .........

( "काव्य-चेतना "में प्रकाशित )

शुक्रवार, 13 जनवरी 2012

सुर और ताल .......


वेद
बन गए वाद.....
शास्त्र
बन गए शस्त्र...
और ‘गीता’ 
रह गई , 
बन कर गीत....





कौन हैं ‘जो
सुर पहचाने
कौन है 'जो'
ताल मिलाए
बैठे हैं , सब के सब
जाल बिछाए..........!!!!!



(....'काव्यांजलि' से ....)
 (काव्य संग्रह...चंडीगढ़ साहित्य अकादेमी)