अमलतास  
यौवन पर ......
गजरे में गुंथे फूल  
ओढ़ दोपहरी का घूंघट 
ढांप देते हैं 
धरा के तापित  
आँचल को .....

बिन सोचे 
बिन समझे 
बिखरने ,रौंदे जाने से 
बेखबर ...
सुवासित 
अपनी ही महक से ......

मुस्कुराते हैं 
धरा के श्रृंगार पर ......

सच ...
कितना सुखद होता है 
मुस्कुराहटों पर 
निस्सार होना ......(अनन्या अंजू )