शनिवार, 20 दिसंबर 2014

फ़िलवक़्त .......!



तुम कौन हो
     और मैं कौन.....

जगेगा सवाल 
जिस दिन ये। 

       खो जाऊँगी जंगल में …

फ़िलवक़्त 
बस, बह रहे हो 
नदी में 
                 समंदर से ……… !! 




रविवार, 10 अगस्त 2014

बस एक नज़र की बात थी.……




तुमने 

बच्चे को उछाला 
आसमान में ....... 

बच्चा निश्चिंत था  ....... 

अचानक 
चूक गई तुम्हारी नज़र 
और....
........................
रात हो गई.…। 
( बस एक नज़र की बात थी.…… )

रविवार, 24 नवंबर 2013

यात्रा ......

कितना अच्छा हो
बच्चों को पढाया जाये 
अ-से अनुज (अनादि )
आ-से आनंद … 

अक्षर से शब्द की यात्रा 
हो जाएगी  सरल … 
और  
वाक्य विन्यास में 
लिख पाएगा 
फिर वही  ,
लिखना चाहेगा  
जो वो कहीं .............. !!

{प्रेरणा स्रोत -अ-से-अनुज }

-अंजू अनन्या-

गुरुवार, 3 अक्तूबर 2013

हसरतें ~~~~~~






बहुत पेचीदा है बनावट इनकी ......

हसरतें हैं  या कि ....

जन्मों का बिखराव ....!!!!!!!

शनिवार, 7 सितंबर 2013

परिवर्तन .....

'अर्थ ' 
कहीं खो गए 
या कहूँ कि
बाज़ार की चकाचौंध में 
दिखते हैं 
जुगनू जैसे .....

बचे हैं तो ' शब्द '
वो भी बिकते हैं 
आज कल 
बड़े बड़े बैनरों की ओट में 

पहने जाते हैं 
कीमती लिबासों के रूप में 
जो बदलते रहते हैं 
मौसम ,जगह और 
परिवेश के अनुसार .................

((" काव्य-चेतना  " में प्रकाशित )

बुधवार, 3 जुलाई 2013

संधि बेला .............


बुझने से पहले
अकसर  
हो जाती है तेज़ ,
दीये की टिमटिमाती लौ......
शायद
कुछ ऐसी ही होती है
पुराने और नए वर्ष की
संधि् बेला ................
जहाँबीता वर्ष
करता है आकलन
तीन सौ चौसंठ दिनों का
औरजोड घटाव के बाद
कर लेना चाहता है दर्ज
अंतिम दिन........
बन जाए जो ‘अर्थ
पूरे वर्ष का 
या फिर 
करता है कोशिश
संवारने की ,
पुराने लिबास को ....
और फिर ,
सपनीले धागों 
आशाओं के रंग से
बुनता है 
एक ‘नया लिबास
जो बेहतर हो
पुराने लिबास से .....
पर ,क्या 
ऐसा होता है...?
ये सवाल
हर साल
इसी संधि् बेला पर
बन जाता है
प्रश्न चिन्ह’ 
और मैं
खोजने लगती हूँ 
उसका हल........

बुधवार, 19 जून 2013

सत्य -सेतु


न्याय और सत्य पथ पर 
राम, तूने एक सेतु बनाया 
विशालता के अहं को उसपे 
नतमस्तक होना सिखाया ...

तुम्हारी सच्चाई पर उसने 
रास्ता था तुम्हें दिखाया 
चरणों को तेरे छूकर 
लहरों ने मर्यादा को निभाया .....

भक्ति और समर्पण को 
हवा ने गले से यूँ लगाया 
तेरे नाम की लय पर 
पत्थर को तैरते पाया .....

तेरे रूप की मोहकता 
जल निहार रहा था मूक 
तुम ही तुम थे सब जगह 
जरा नही थी चूक .......

पर देखो फिर से 
उठी है एक बयार 
विकास की लय पर 
एक सेतु बने आर पार .......

आगे बढने की प्रभु 
लगी ये कैसी होड़ 
जाना कहाँ ,मालूम नही 
फिर भी लगी है दौड ........


कोई जाये जाकर देखे सागर 
चीख चीख कर करे पुकार 
मत बांधों मुझे ,बहने दो 
ना खड़ी करो तुम दीवार ...

कहीं सरहदें ...कहीं दीवार 
कहीं जाति, कहीं धर्म विवाद 
तेरी नैसर्गिकता से प्रभु ..
बुद्धि  करती क्यूँ है छेड़छाड़ .....

एक दिन ऐसा आएगा ..
सुन लो प्रभु का नाद 
यही उच्छृंखलता कभी तुम्हें 
हे मानव, कर देगी बर्बाद ....



बाहर से तुम खूब फले हो 
अन्तर में बसता खालीपन ..
झाँक लो भीतर एक बार तुम ...
विकसित हो जाएगा तन मन ........
.................................................
 { अंजू अनन्या }

{ "काव्य-चेतना " से }


शुक्रवार, 7 जून 2013

दृष्टिभ्रम.................


खुदको
साबित करने की चाह
अंतत :
साबित होकर भी
दब जाती है
मुठी  भर
मिट्टी के नीचे .....

फरोला  जाता है
जिसे
बार -त्यौहार
या फिर
कभी लभी
तलाशते हैं
मिट्टी से
जुड़े लोग ही
मिट्टी में
रूह का अस्तित्व  ......

गाहे बगाहे जो
दे जाता है
एहसास  
उनके होने का

पर विचारणीय है ...??!!

मुठ्ठी भर मिट्टी
रहती है कब तक .?

मौसमों में
बिखरती
घुलती
बहती ...
अंतत : हो जाती
ज़र्रा...

छोड़ देती हैं
ज़मीन
बन जाती है
 आसमां

रह जाता है
दृष्टिभ्रम ...........!
(" काव्य-लहरी " में प्रकाशित )



                                                                                                                                                                                                       

गुरुवार, 28 मार्च 2013

क्षणिका ..प्रेम (२)



तुम 
नही जता पाते प्रेम 
मेरे प्रति ...
क्यों ..? 
 क्यूंकि 
नही किया तुमने कभी प्रेम ...
चंद शब्दों से 
लिख देते हो इतिहास ...../
पर प्रेम तो 
 वर्तमान है ....
 है ना..... !!!! 
(अंजू अनन्या)