मंगलवार, 14 फ़रवरी 2012

प्यार’.......





प्यार
एक शब्द
जिसके अर्थ को ‘कुछ
स्वतंत्र हाथों ने
इतना उपर उछाला
कि
लटक गया है
धरती और आकाश 
के बीच,
ना जमीं ही
पकड़ पा रही है उसे
और नाआसमान ही
झुकना जानता है...

( "काव्य-चेतना "में प्रकाशित )

13 टिप्‍पणियां:

  1. ‘प्यार’एक शब्द
    जिसके अर्थ को ‘कुछ’
    स्वतंत्र हाथों ने
    इतना उपर उछाला
    कि,लटक गया है
    धरती और आकाश
    के बीच,त्रिशंकु की तरह,
    बहुत सुन्दर भाव.... :)
    ये रचना १७ फरवरी को नई-पुरानी हलचल पर प्रस्तुत की जारही है.... :)

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  2. कल 17/02/2012 को आपकी यह पोस्ट नयी पुरानी हलचल (विभा रानी श्रीवास्तव जी की प्रस्तुति में) पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  3. बहुत ही अच्छे से परिभाषित किया है आपने!

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  4. छोटी सी किन्तु विस्तृत व्याख्या प्रेम की।
    बेहतरीन रचना....
    नेता- कुत्ता और वेश्या (भाग-2)

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  5. क्या बात कही आपने...
    बहुत सुन्दर..
    जैसे अमृता जी ने कहा..आकाश कुसुम..

    शुभकामनाएँ..

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