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गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

मरीचिका ........



वह दृष्टि 
अब भी

मुझमे है......!
उसमे डूबी
लड़ रही हूं
मैं ,स्वयं  से !
क्या ..
भ्रम है वो मेरा 
या फिर 
है मरूभूमि में 
जल  का आभास ....!!
छोड़ दूँ खोज 
किसी डर से 
या दौड लूँ ,उस 
परछाई के पीछे .....!
जिज्ञासावश  देखा 
फिर से उन आँखों में 
जाने क्या सूझा ,
दौड पड़ी 
उस जल जैसे आभास को 
अंजुरी में भरने ...!!!
जानती थी 
 नहीं , ये कुछ ओर 
है केवल 
मन की मरीचिका ..!!
शायद ...
जीवन भी तो 
है मात्र...
एक जीजिविषा ..............(अनन्या अंजू )

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

टुकड़ा टुकड़ा दर्द ...किरची किरची चुभन .......

....(1).....


मिठास पर 

खिंचती चली आई थी

मक्खियाँ ......

अंतत: मिठास 

निगल गई 

उनके

कोमल वजूद को .....!!!!!!  




....(2)..... 



 तुम 

देवता हो 

और मैं  

इंसान ......

बस यही

एक फर्क है 

जो करता है जुदा ...

मुझे  ' तुम ' से 

और तुम्हें 

'तुमसे '....................!!!!  (अनन्या अंजू )





........(3).......



.खामोश रहना ....

कुछ न कहना ..... !

कहने से

भिन भिनाएगी मक्खियां  

इसलिए ..जख्मों को  

जरा सा ,

ढक कर रखना .....!!



मवाद के साथ  

चाट जाएँगी  

ये लहू ...

हो जायगा मुश्किल  


फिर  

दर्द को सहना ...!!!



आखिरी सांस की

टीस...

कर देगा आसान .... 

ख़ून जमी  

शिराओं में  

दर्द का बहना..........!!!!!!

(अनन्या अंजू )


शनिवार, 25 अगस्त 2012

आसमां ने ........ रख दी चुप्पी ....!!!!

बरसों पहले 
आसमान ने 
धरती से कुछ कहा .....! 

धरती कुछ कहती 
आसमां ने 
लरजते होंठों पर 
रख दी चुप्पी .....
................
कहना सुनना
 रहा चलता 
एक रोज़ 
बरस पड़ा 
आसमान ...
खिसक गई 
धरती के 
पाँव नीचे की 
जमीं...............!!
.............................
एक आँधी 
झोंक  गई धूल 
धरती की आँख में .....
और किरकिरी ने 
बंद कर दी आँख ....!!!
....................
वक्त बदला 
मौसम बदले 
जारी रहा ...
आसमां का बरसना 
मिट्टी का घुलना .......!!!!
......................................
यूँ परत परत फैलता 
धरती का प्रेम ,
महक सा उड़ता 
जा पहुँचता आकाश ..
आसमान 
हो गया इन्द्रधनुषी ........!!!!!
 .....................
धूप ने 
जकड लिए पाँव 
बस ,तब से 
सीख लिया धरती ने 
मूक रहकर 
ताप को पीना .....
और 
टिका लिए 
जमीं पर 
अपने पाँव .........!!!!!!

शनिवार, 18 अगस्त 2012

परवाह

अचानक
एक तेज़ रफ्तार
गाड़ी ...
कुचल गई
राहगीर को .......

भीड़
इकट्ठा हुई और
गिने जाने लगे दोष ...
और होने लगी
तहकीकात
दोषी की .....

भीड़ में ही
मौजूद था कोई
कवि ....
लिख डाली तुरंत
एक मार्मिक कविता
...............

अगले दिन
दोनों सुर्ख़ियों में थे ....

एक मार्मिक भाव की
नई  रचना के लिए ....

और दूसरा
'सडक हादसे ने 
ले ली एक और जान ......!!!!

और यूँ ....
रचनायें जन्मती हैं 
मरती
है .......
जड़  और चेतन की परवाह
कौन करे ......???



मंगलवार, 31 जुलाई 2012

सिर्फ एक बार .....

तुम्हे  आदत है
चलने  की बहुत ..
वो भी
 तेज़ रफ़्तार क़दमों से....
(मुझे रुक कर मुड कर देखना )....
अचानक तुम  
चलते चलते दौड़ने लगे ....
तब से ...
मैं ......धूल से सनती...
आँखे मलती....
निशाँ पकडती ...
लकीरों को झाडती ...
हो गई हूँ एक लकीर ...
जो बनती, मिटती
न तेरे हाथ तक पहुंची ...
देखो ..! मिटने लगी है .अब
इससे पहले के हो जाये लुप्त
रौंद जाये
गाहे बगाहे पड़ते पाँव...
मिट जाये  निशाँ..
न बचे शेष ...
हो जाये अवशेष
लौट आओ ....
एक बार ...
उकेर लो ..
अपने हाथ में
सिर्फ एक बार .....

शनिवार, 30 जून 2012

फलसफ़ा .............!!!!!!!! (१)

डूबने की बात  
करते हैं अक्सर 
तैरने वाले .... !

लहरों के साथ 
जो रहते हैं खेलते ,
मोड लेते हैं रुख 
चट्टानों के आने पर ..
छोड़ देते है उन्हें 
टूट कर 
बिखरने के लिए ...!!

लेते हैं तलाश 
फिर से ,
कोई नई लहर ...
ले जाती है जो उन्हें  
कुछ और दूर ...

यूँ नाप लेते हैं 
वो समंदर को ...
और अंतत :
जीत लेते हैं बाज़ी .....!!!

देखते हैं मुस्कुराकर 
समंदर की ख़ामोशी को ...
पर ,क्या  मालूम उन्हें 
नापने की कोशिश में 
हार गए , वो खज़ाना 
जो छुपा था 
समंदर  की  गहराई में .....!!!! 
( "काव्य-चेतना "में प्रकाशित )

रविवार, 24 जून 2012

रिश्ता ..............

आदमी को 
चाहिए थी औरत 
औरत को एक रिश्ता ....
दोनों के बीच था 
गहरा समंदर ....
न वो आर हुए ....
न पार ....
बस  बंधे रहे 
डोर के दो सिरों से .........
( "काव्य-लहरी " में प्रकाशित )

बुधवार, 16 मई 2012

चाहत ............!!

चाहते हो पालना  
मन के आँगन में 
कुछ  भी  ऐसा  ,
जो  कम  कर दे  
सूनापन ....!

पालना ये सोच कि 
चाहते हो तुम  
किसी को ...
महका देगी ये 
आँगन को 
बेला के फूल सा ......!!

कोई चाहता था 
चाहता है ..या  
चाहेगा तुम्हे...
मत बीजना  
कभी ये भरम  
सूने आंगन में ....!!!

फ़ैल जायेगा ये  
खरपतवार की तरह 
छोड़ जायेगा तुम्हें 
तब, आँगन का 
सूनापन भी.....!!!!

और यही नही ,
खो जायेगी उसकी  
सहज , सरल 
विशालता ................

(अनन्या अंजू )
 ( "काव्य-चेतना "में प्रकाशित )

मंगलवार, 17 अप्रैल 2012

जिंदगी......(2)



 उसने पूछा
 जिंदगी क्या है.....?
 मैंने कहा, 
 पागल हो क्या...!
 ये सवाल
वो भी औरत से !!
क्या तुमने , कभी
किसी औरत को
जीते हुए देखा है ........!!
(अंजू अनन्या )

( "काव्यांजलि " में प्रकाशित )


शनिवार, 7 अप्रैल 2012

जिंदगी......


उसने कहा.........
जिंदगी क्या है 
एक खूबसूरत गीत
या कोई हसीन ख्वाब ..... 
मैंने कहा
गीत या ख्वाब
तो नहीं पतापर हॉ
जीने के लिये
जरूरी है
कुत्ते सी वफादारी
क्योंकिजरा सी ‘चूक
बना देगी ‘लावारिस
इतना ही नहीं
घोषित कर दिऐ जाओगे
हलकाए’ हुए
और मार दिए जाओगे
बेमौत
मीठी रोटी में
मिलाकर जहर
तबजिंदगी के मायने
चढ़ जाएगे बलि
म्यूनसपैलिटी’ वालों के
जनसुरक्षा
अभियान के तहत.....!!

( "काव्यांजलि " में प्रकाशित )