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रविवार, 24 जून 2012
बुधवार, 16 मई 2012
चाहत ............!!
चाहते हो पालना
मन के आँगन में
कुछ भी ऐसा ,
जो कम कर दे
सूनापन ....!
पालना ये सोच कि
चाहते हो तुम
किसी को ...
महका देगी ये
आँगन को
बेला के फूल सा ......!!
कोई चाहता था
चाहता है ..या
चाहेगा तुम्हे...
मत बीजना
कभी ये भरम
फ़ैल जायेगा ये
खरपतवार की तरह
छोड़ जायेगा तुम्हें
तब, आँगन का
सूनापन भी.....!!!!
और यही नही ,
खो जायेगी उसकी
सहज , सरल
विशालता ................
(अनन्या अंजू )
( "काव्य-चेतना "में प्रकाशित )
(अनन्या अंजू )
( "काव्य-चेतना "में प्रकाशित )
मंगलवार, 20 मार्च 2012
ख्याल .....................
रूह में उतरा है सूरज इन दिनों ...
बिखरे पत्तों को समेटती है जब हवा ...
खनकती है कोई आवाज़ इन दिनों .....
बचा कर आसमां से नजर ,खिड़की से
उतरता है चाँद ,मेरे घर इन दिनों......
न दरिया , न पत्थर ,न ही पानी ..
फिर भी आँखों में है भंवर इन दिनों ....
ख्याल उसके की पाकीज़गी तो देखिये ....
खुदा में भी आता है ,वो नजर इन दिनों ......
मिला जब वो ,खुदी में मिल गया .....
तलाश में जिसकी गुमशुदा थे इन दिनों .....
गुरुवार, 1 मार्च 2012
बुधवार, 1 फ़रवरी 2012
इंतज़ार .......
इंतज़ार.....
नहीं सिला
जा सकता ....
यकीनन ,
सिला जा सकता ,
तो .....
बन जाता लिबास ....
जिसे जब चाहा...
फैंक दिया जाता ...
उतार कर.....या
दे दिया जाता...
किसी को दान में .....
या बेच दिया जाता ...
बाज़ार में ...
किसी नई
ख्वाहिश की खातिर .....!
शायद ..
इसी लिए
पहनता है इसे
कोई फरियादी ,
लपेट कर खुद को
सहेजता है जैसे....
स्वयं को ,
स्वयं में से ....!!!
सोमवार, 26 दिसंबर 2011
कान्हा ,कहाँ लिख पाऊँगी ...
कहाँ लिख पाऊँगी
मैं ,राधा के प्रेम को .....
लिख देती 'वो '
स्वयं.......
लिखना तो दूर ,
कहा भी तो नही
कभी उसने .....!!
बस किया ...
तुमसे प्रेम ,और
किया भी ऐसे
कि खुद
हो गई
प्रेम स्वरूपा..
और तुम्हे
बना लिया
अनन्य भक्त.....!
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
इसलिए, कान्हा..!
मत होना नाराज़ ,
नही लिख पाऊँगी
मैं कभी
चाह कर भी .....
पर हाँ ,देना मुझको
वो दृष्टि ....
पढ़ पाऊं
उस नेह को ...
प्रेममयी आँखों की
मुस्कान में ...
तेरी बांसुरी की
तान में ...
उसके चरणों की
थकान में ...
तेरे हाथों की
पहचान में ...
आंसुओं के
आह्वान में ...
भक्ति के
विरह -गान में ...
दो रूप
एक प्राण में ...!
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
प्रेम ,भक्ति की
यही गलबहियां
खींच लेती है मुझे ....
आत्मविभोर हो
खिल उठती हूँ ...
खुद ब खुद ही ...
देखती हूँ ,
कनखियों से ,
सकुचाहट के साथ ...
मुस्कुरा देते हो
तुम भी
राधा के साथ ......!!!
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
बस ,कान्हा ...!
यहीं से ,
होता है शुरू
एक सफ़र .....
हवाओं के उठने का ...
समंदर में उतरने का ...
बादल के बनने का ...
आसमान में उड़ने का ...
बरसात के होने का ..
मिटटी के भीगने का ...
फूलों के खिलने का ...
महक के बिखरने का ...!!!!
,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,,
इससे पहले कि
बिखर जाऊं ...
तान देते हो
चादर झिलमिल सी ....
छोड़ देते हो मुझे
फिर एक और ...
यात्रा के लिए .....
.......................
पर ,सुनो कान्हा ..!!
राह भी तेरी ...
यात्रा भी तेरी ...
पर मंजिल
है मेरी ...!
इसलिए कान्हा ...!!!
न भूलना 'तुम '
कभी ये बात ........
क्यूंकि
यात्रा ,
कितनी भी लम्बी हो ...
राह ,
कितनी भी कठिन हो ...
मंजिल तो
निश्चित है ........./
इसलिए कान्हा ...!
उतर जाने दे ...
हो जाने दे
समंदर ....
शायद ,तब
कह पाऊं ...
लिख पाऊं ....
कुछ ऐसा
जो हो बिलकुल
तेरी राधा के जैसा ..........
तेरी वंशी के प्राण जैसा .......
मंगलवार, 13 दिसंबर 2011
तारुफ़ मेरा....
जब से ,पकड़ा है तूने , हाथ ये मेरा...
छूटता जा रहा ,जग से ,ताल्लुक मेरा ....../
.............................. ...................
रात भर ,हरसिंगार सा,मैं खिलता रहा ....
हर सुबह रहता है ,तेरी आँखों में ,तारुफ़ मेरा...../
...........................................................
न मैं मीरा बनी, न मैं राधा हुई ...
रिश्ता तुझसे बहुत ही है नाज़ुक मेरा ......./
......................................
न मैं मीरा बनी, न मैं राधा हुई ...
रिश्ता तुझसे बहुत ही है नाज़ुक मेरा ......./
......................................
गुरुवार, 3 नवंबर 2011
मंगलवार, 27 सितंबर 2011
तुम.....
तुम झूठ पे झूठ कहते रहे
मैं यकीं पे यकीं चिनती रही ....
मेरे यकीं के पुल के नीचे से
तेरे झूठ की नदी बहती रही ...
सोमवार, 12 सितंबर 2011
शनिवार, 27 अगस्त 2011
गुरुवार, 18 अगस्त 2011
रविवार, 7 अगस्त 2011
सोमवार, 25 जुलाई 2011
भाव
भाव बिन
सूनी भक्ति.....
प्रेम बिन
सूना जीवन .....
बिन मन
निभे न रिश्ते...... ,
दिखते जैसे
लिबास और तन.....
सोमवार, 11 जुलाई 2011
गुरुवार, 7 जुलाई 2011
(.......क्यूँ ...........)
विरासत भी
....तू.....
वारिस भी
.....तू.......
फिर
वसीयत में
उलझनें
इतनी ,
बता ....
क्यूँ ..?????
लिखता है
तू......!!!!!!!
बुधवार, 8 जून 2011
अंतर
अंतर है
मंदिर के पत्थर
और
रास्ते के पत्थर
में
इतना ही
एक पर
विश्वास किया
तुमने ...
और
दूसरे ने
तुम पर .......
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