Powered By Blogger

शुक्रवार, 5 अक्टूबर 2012

स्वाधीनता दिवस की बधाई आज क्यूँ ......????? इसे आप को कल देना चाहिए .....आज के दिन तो भाई भाई  से अलग हो गए थे ...धरती जो अनंत है ....उसे एक टुकड़े में और बाँट दिया गया .....और नाम दे दिया सरहद ..........सरहदे जो आज भी तकती हैं राह उन खोये कदमो की आहटों का ....जो बाँध दिए गए है ...दस्तावेजों के साथ .......वो आँखे जो ...सरहद पर ...देखती हैं एक दूसरे को ...पर नही मिला पाती हाथ .....क्यूंकि मुकरर्र है वक्त ........सांझ से पहले ...बंद हो जाते हैं खुले दरवाजे ....एक भीड़ ...होती है इकठ्ठा .....बिखर जाती है धीरे धीरे ...देखती है मुड कर मायूसी से .....एक ही हवा में ...फेहराए जाते हैं ...दो परचम ... करते है बातें ....दोनो  परचम सर्वाधिकार सुरक्षित


गुरुवार, 4 अक्टूबर 2012

मरीचिका ........



वह दृष्टि 
अब भी

मुझमे है......!
उसमे डूबी
लड़ रही हूं
मैं ,स्वयं  से !
क्या ..
भ्रम है वो मेरा 
या फिर 
है मरूभूमि में 
जल  का आभास ....!!
छोड़ दूँ खोज 
किसी डर से 
या दौड लूँ ,उस 
परछाई के पीछे .....!
जिज्ञासावश  देखा 
फिर से उन आँखों में 
जाने क्या सूझा ,
दौड पड़ी 
उस जल जैसे आभास को 
अंजुरी में भरने ...!!!
जानती थी 
 नहीं , ये कुछ ओर 
है केवल 
मन की मरीचिका ..!!
शायद ...
जीवन भी तो 
है मात्र...
एक जीजिविषा ..............(अनन्या अंजू )

गुरुवार, 13 सितंबर 2012

टुकड़ा टुकड़ा दर्द ...किरची किरची चुभन .......

....(1).....


मिठास पर 

खिंचती चली आई थी

मक्खियाँ ......

अंतत: मिठास 

निगल गई 

उनके

कोमल वजूद को .....!!!!!!  




....(2)..... 



 तुम 

देवता हो 

और मैं  

इंसान ......

बस यही

एक फर्क है 

जो करता है जुदा ...

मुझे  ' तुम ' से 

और तुम्हें 

'तुमसे '....................!!!!  (अनन्या अंजू )





........(3).......



.खामोश रहना ....

कुछ न कहना ..... !

कहने से

भिन भिनाएगी मक्खियां  

इसलिए ..जख्मों को  

जरा सा ,

ढक कर रखना .....!!



मवाद के साथ  

चाट जाएँगी  

ये लहू ...

हो जायगा मुश्किल  


फिर  

दर्द को सहना ...!!!



आखिरी सांस की

टीस...

कर देगा आसान .... 

ख़ून जमी  

शिराओं में  

दर्द का बहना..........!!!!!!

(अनन्या अंजू )


शनिवार, 25 अगस्त 2012

आसमां ने ........ रख दी चुप्पी ....!!!!

बरसों पहले 
आसमान ने 
धरती से कुछ कहा .....! 

धरती कुछ कहती 
आसमां ने 
लरजते होंठों पर 
रख दी चुप्पी .....
................
कहना सुनना
 रहा चलता 
एक रोज़ 
बरस पड़ा 
आसमान ...
खिसक गई 
धरती के 
पाँव नीचे की 
जमीं...............!!
.............................
एक आँधी 
झोंक  गई धूल 
धरती की आँख में .....
और किरकिरी ने 
बंद कर दी आँख ....!!!
....................
वक्त बदला 
मौसम बदले 
जारी रहा ...
आसमां का बरसना 
मिट्टी का घुलना .......!!!!
......................................
यूँ परत परत फैलता 
धरती का प्रेम ,
महक सा उड़ता 
जा पहुँचता आकाश ..
आसमान 
हो गया इन्द्रधनुषी ........!!!!!
 .....................
धूप ने 
जकड लिए पाँव 
बस ,तब से 
सीख लिया धरती ने 
मूक रहकर 
ताप को पीना .....
और 
टिका लिए 
जमीं पर 
अपने पाँव .........!!!!!!

शनिवार, 18 अगस्त 2012

परवाह

अचानक
एक तेज़ रफ्तार
गाड़ी ...
कुचल गई
राहगीर को .......

भीड़
इकट्ठा हुई और
गिने जाने लगे दोष ...
और होने लगी
तहकीकात
दोषी की .....

भीड़ में ही
मौजूद था कोई
कवि ....
लिख डाली तुरंत
एक मार्मिक कविता
...............

अगले दिन
दोनों सुर्ख़ियों में थे ....

एक मार्मिक भाव की
नई  रचना के लिए ....

और दूसरा
'सडक हादसे ने 
ले ली एक और जान ......!!!!

और यूँ ....
रचनायें जन्मती हैं 
मरती
है .......
जड़  और चेतन की परवाह
कौन करे ......???