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गुरुवार, 9 मई 2013

जू
हम थेहम हैंहम होंगे
या पिफर लेंगे जन्म
ऐसा मानते है हम
शास्त्राों से सुनकर ण्
तो राम थे,
राम हैंऔर पिफर
वो भी होंगे
इसी लोक में
ऐसा क्यूँ नहीं मानते
क्यूँ उछालते हैं किसी बात को,
क्यूँ जोड़ते है भावनाओं से,
क्यूँ तलाशते हैं सबूत
उन सबके वजूद का
---
जबकि हमआज तक
नहीं तलाश पाए,
अपना ही वजूद
इस ब्रमाण्ड में
भोली आस्था की नींव पर
क्यूँ बनाते हैं दीवारें
कभी जन्मभूमि तो
कभी राम सेतु के नाम पर,
जबकि अपने ही घर में
अपने ही पालने वालों की
हर निशानी कोबहा देते हैं
गंगा में
या पफेंक देते हैंबेकार समझकर
तसल्ली के ​लिए,
कहते हैं खुद सेकि ‘वो
हमेशा हमारे साथ है
क्योंकि
हम ‘‘उन्हीं’’ का अंश है
तो पिफर ‘वो
जो सबका है
सब ‘जिसके’ अंश हैण्ण्
क्यूँ रख दिया है उसे
अलग थलग
एक अंध्ेरे कोने में,ण्और
उसकी महत्ता के लिए
पूजते हैं उसकी निर्जीव
निशानियों को,
जबकि बहा देते हैं लहू
उसी के सजीव अंशों का
किसी ना किसी
धर्मिक संवेदना की
आड़ में,
अपने निहित स्वार्थों की
पूर्ति हेतु 
सर्वाधिकार सुरक्षित

कुछ रिश्ते .....होते हैं बहुत खूबसूरत...........!!!!!!!!





कुछ रिश्ते .....
होते हैं बहुत खूबसूरत.......!
हो सकता है  
मेरी ये बात ...
तुम्हें नागवार गुजरे .....
ये भी हो सकता है ...
तुम ...जड दो कोई पैबंद 
मेरे झूठे होने का ....
पर सुनो ..!
मैं उस पैबंद पर
चिपका दूंगी ...एक शीशा
और ...टांक दूंगी ...
उसके इर्द गिर्द ...
कुछ मोती और सितारे .........(१)

हो सकता है ....
सुई की नोंक से  
कुरेद ......
खींच कर  धागा  
उधेड़ दो कोई सीवन  
खुले सिरे... 
बन जाये भद्दापन ....
झांके नंगापन .....
दे दूंगी नया रूप 
नया आकार ....
जो जायेगा संवार ........
सुनो  ! 
दोनों सिरों को जोड़ती 
मैं बांधूगी एक डोरी  ....
जैसे गोटा किनारी  ........(२) 

हो सकता है तुम ......
तेज धार से  
कतर डालो  
छोटी छोटी कतरनों में ........! 
फिर भी ....
एक एक कर ...
जाउंगी लपेटती ........
और बुन लूंगी   
उस गोले से ....
एक आसन ..पाकीज़ा ..!  
सुनो ...!
रख मंदिर में .....
कर लूंगी ध्यान .....
पा जायेगा पहचान .....
होकर के मुक्तिगान ......!!!!! (३)
--अंजू अनन्या --


मंगलवार, 7 मई 2013

दिल के पास ................!!!!


दिन ,तारीखें
रचती हैं इतिहास ......!

वर्तमान के गले में
हो जैसे फांस ......!!

आया नही ...आएगा जो
है मात्र आभास ..........!!!

इसलिए
रख लेती हूं
दिल के पास ......!!!!

जी लेती हूं
आती जाती
हर सांस के साथ ....................!!!!!
(अनन्या अंजू ) 


शुक्रवार, 3 मई 2013

रंग ......................



बेशक रंग नही है मेरे हाथ में ....


कुछ स्वप्न तो है भर आँख के ....


जब जब हुई है यूँ ही सी बौछार ...


महके है फूल टेसू और पलाश के ................


रंग वही जो रंग दे मन ..........!!!!!!!!!!!!!



~~~~~~~~~~~~~~(१) ~~~~~~~~~~~~~~~~~

धुँधलाने लगे है रंग ...फिर भी 
चांदनी सा कोई रहता है संग...!!!

~~~~~~~~~~~~~~`२~~~~~~~~~~~



अपेक्षा ...............


अपेक्षा के धरातल पर 
निर्भरता की सीढ़ी ...
चेतना संभाल कर रखे 
कितना ही पाँव 
जड़ता आती ही जाती है
 हर सीढ़ी के बाद ....
..........
आखिरी शिखर पर 
बस मोमेंटो सा 
रह जाता है नाम ....

जरूरी है चेतना की  सम्भाल 
जैसे अधखिली पतियों को 
सहेजता है गुलाब ...............!!

{वेदना जब अहसास में उतरती है ....तो सम हुए बिना नही रहती ....../// एहसास ही मृत ( जड़) हो जाये तो अलग बात है }

~~~~अंजू अनन्या ~~~~~~~

सोमवार, 22 अप्रैल 2013

इंतज़ार ..........

गुलमोहर ...

खिलने लगा है ....

नन्ही नन्ही कोंपले

 सजाने लगी है

सूनी टहनियों को.......


कभी कभार

आ जाती है कोई चिड़िया

जीवित ख्वाहिशें ..

रंग बिरंगे सपने

बुनना चाहती है शायद

वो एक आशियाँ .....!!


पर

अभी नाज़ुक हैं पत्तियां

बाकी है सहम 

बे-रुखे मौसम का

अभी पीना है ताप ....!



आम्र बौर के गीत

जब गायेगी  कोयल

गुनगुनायेगा तब

गुलमोहर ...



 कुहू कुहू की पुकार


तोड़ेगी नीरवता के तार

झंकृत होगा

यादों का सितार......!!



शायद इस बार

हाँ ..इस बार


रंग लाए

गुलमोहर का

इंतज़ार ...........!!!!

(अंजू अनन्या )


गुरुवार, 28 मार्च 2013

क्षणिका ..प्रेम (२)



तुम 
नही जता पाते प्रेम 
मेरे प्रति ...
क्यों ..? 
 क्यूंकि 
नही किया तुमने कभी प्रेम ...
चंद शब्दों से 
लिख देते हो इतिहास ...../
पर प्रेम तो 
 वर्तमान है ....
 है ना..... !!!! 
(अंजू अनन्या)

क्षणिका ...प्रेम ...(१)



(१)........
उसने टूट कर
किया था प्रेम ..!
इतना टूटा
कि किर्चियों की चुभन
रह गई बाकी ...
अब किरची दर किरची
निकालता है जिस्म से
और बींध देता है
उस प्राणमयी टहनी में ....
(रिसते प्राण नही दिखते )
कहने को
फूलों से बहुत प्रेम है उसे
सहेजने का हुनर जानता है ...
पर ...
नही समझ पाता
प्रेम की  पीड़ा को .....!!!
(पत्तियां बिखरती रहती हैं )........

(अंजू अनन्या )

रविवार, 17 मार्च 2013

शीर्षक से परे ..........!!!!!!




स्थापित ईश्वर
चला गया ......
खंडित हो गया था मन ..!

कर दिया प्रवाहित 
बहती धारा में ..!

ईश्वर 
देवघर में रहता है 
खंडहरों में नही .....!!!

(अंजू अनन्या )


( ईश्वर प्रेम हो सकता है ...'प्रेम' ईश्वर का ही तो दूसरा नाम है .......)

मंगलवार, 12 मार्च 2013

लम्बी बात ..............



    
 कभी कभी 
 कितनी लम्बी 
 हो जाती है बात ..
कि शब्द 
जाते है खो .. ..
 अर्थ 
देते है बदल ,
 मायने उस बात के .....
बात और 
 बात के बीच की 
लम्बाई को 
 नापना भी
होता है 
नामुमकिन  ....
क्यूंकि  आसमान का 
नही होता 
कोई सिरा .....
बस रात बाकी की तरह 
अंत में 
बात तलाशती है 
फिर एक 
नया सिरा .......