कल ,
बरसात में
धरती का इक टुकड़ा
गया था भीग .....
बहुत खुश थी
उसकी सौंधी खुशबू
समेटने में ........
आज
यकायक ,बरस पड़ा
सूरज का आक्रोश
उसी टुकड़े पर ...
नमी हो गयी गायब
और वो
गिनने लगी द्र्रारे
पपड़ाई जमीन पर ..................
{.....अनन्या .....}
..............................................................................................
(२)
भटकते ,
फैला दी बाहें
धरती ने ,और
दे दी पनाह
अपने आँचल में
......
अगली सुबह
देखा
मुस्कुरा रहा था
धरती का आँचल
शायद
रात भर रोने के कारण ...........!!
[( अनन्या ) ...
कविता संग्रह "काव्य लहरी " से ]