ANANYA
शनिवार, 9 नवंबर 2013
सड़क और रास्ता .......(१)
(१)
सड़क
चलना चाहती थी
साथ साथ
पर खोदते रहे बारम्बार …
सड़क कटती रही
रास्ते से
बन जो गया
एक गड्ढा ….
अब
सड़क निश्चिन्त है
और, सम्भलना
रास्ते को है ………
बुधवार, 6 नवंबर 2013
'जल' से ........
'पानी' का मैलापन
बोला 'जल' से
मत ठहरो ,बहते जाओ
छोड़ घाट
कल-कल से …………
बहना … तुम्हारी प्रवृति है …
रुकना पानी की 'नियति
..........
नियति चक्र को पार कर
मिट जायेगा मैलापन
तब भाप सा उड़ता
ठहर जाउंगा किसी
श्वेत कण सा
हिम शिखर पर
.......
सूरज का ओज
देगा पिघला
बह आऊंगा तुममे
जल होकर ……
तब मिल जाना तुम
मुझे
उसी तलहटी पर
न हो पाऊँ अलग कभी
घुल जाऊं ,तुममे
तुम होकर ………… !!!
सोमवार, 28 अक्टूबर 2013
.चक्रव्यूह...{पोस्टेड इन हरिप्रिया ...28oct.2013}
तुम्हारी
नन्ही माखन सनी
उँगलियों को थाम
आना चाहती हूँ बाहर
इस चक्रव्यूह से ------
'प्रवेश' निश्चित था ---
बाहर आना अनिश्चित --
कर दो सुनिश्चित
हटा दो ये आवरण
' मैं ' मेरे से बाहर
देखना है मुझे स्वयं को
उस पारदर्शिता में ..........
गुरुवार, 24 अक्टूबर 2013
वर्जित प्राण ............
लिबास तन का
बदलना
होता है कितना आसां
काश ! होता इतना ही आसां
रूह का लिबास उतार फेंकना
कर देना दान ,किसी
ग्रहण की छाया में …….
या फिर उधेड़ कर सीवन
टुकड़ा टुकड़ा लिख देना
दरवाज़े ,खिड़कियों के नाम
पोंछने को धूल
या बांधने को घाव…।
या फिर काट-छांट कर
किया जा सकता पायदान…।
घूरती नजरें
बींधती है मन-आत्म
सिकुड़ने पर भी तो
घुटती है श्वास
क्या ,सांस लेना
जुर्म है….
ईश्वर ?!
या वर्जित हैं
उन्मुक्त प्राण
.…!!!
गर हाँ.…तो
अपने ही हाथों
नोच कर
उतार फेंकने का
ह्क़
नही तो ,
हौंसला
ही दे दिया होता …….
छीजता लिबास
आत्म का परिहास
नही देखा जाता
अब मुझसे......
क्या यही नियति है ……
हाँ ,तो
कर दे राख
रह जाने दे
मात्र आभास ..........
गुरुवार, 3 अक्टूबर 2013
बुदबुदाहट ...............
बहुत उदास है ..............
कमरा
कमरे की दीवारें
छत ताक रही
अपलक ....
ओर फर्श
बैठा है
कान सटाए .....
कहीं कोई जो
आहट आये ...!!!!
दो पदचिन्ह
कसमसाते से
मुंह फेर कर
बैठ गई वो कुर्सी
बुदबुदाने लगती है कभी कभी ....
हसरतें ~~~~~~
बहुत पेचीदा है बनावट इनकी ......
हसरतें हैं या कि ....
जन्मों का बिखराव ....!!!!!!!
गुरुवार, 12 सितंबर 2013
नन्ही बूँदें ................
जड़ों के बीच से
काट दिया पेड़
मुरझा गया था
जड़े लगी थी सूखने ----
हवा के साथ
कोई बादल आया
और
बरस गया ----
जाने क्या था
नन्ही बूंदों में ---!
वो ' जल ' ही रहा होगा ----
समझ गया जड़ों की प्यास
दिखाई देने लगी है
हरीतिमा
और कोंपले
'हैं ' मानो
प्रतीक्षारत -------
शनिवार, 7 सितंबर 2013
परिवर्तन .....
'अर्थ '
कहीं खो गए
या कहूँ कि
बाज़ार की चकाचौंध में
दिखते हैं
जुगनू जैसे .....
बचे हैं तो ' शब्द '
वो भी बिकते हैं
आज कल
बड़े बड़े बैनरों की ओट में
पहने जाते हैं
कीमती लिबासों के रूप में
जो बदलते रहते हैं
मौसम ,जगह और
परिवेश के अनुसार .................
(
(" काव्य-चेतना " में प्रकाशित )
सोमवार, 26 अगस्त 2013
मैं लिखती कहाँ हूँ .........
मैं ..लिखती
कहाँ हूं ...?
जब भी चाहा
कुछ लिखना
कहाँ , लिख पाई
लिखा जाता है
जो भी ..
होता है
उसकी रजा से ..
वो बोलता
मैं सुनती हूँ
और
कलम
खुद ब खुद
बिखर जाती है
खाली पन्नों पर ....
यूँ मिट जाता है
फासला
कलम -कागज
मेरे -उसके
बीच का .....
(" काव्य-लहरी " में प्रकाशित )
नही पुकारना ......
आधी रात ..कोई तारा टूटा
नही देखा ...नामुराद जो ठहरा ........
कोई उठा किसी नाम के साथ
अंधी आँखें ..खंगालने लगी अंधेरा ......
"कितनी भी याद आये नही पुकारना "
.....लबों पर चिपका कर चला गया कोई
रिमझिम रिमझिम तेज बौछारें
भेदती जैसे रात कि नीरवता ...
रोता रहा आसमान ..लिए पलकों पे हिचकियाँ
चाँद नदारद था ......................
बारिशों से उसे कब लगाव होता है
रहता है चांदनी में साथ
{...................}
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