रविवार, 27 नवंबर 2011

बीज और जड़


बीज 
जब बोया 
था एक भाव ...
अंकुरित ,
पल्लवित ,और फिर 
हो गया 
फलीभूत 
एक सुंदर 
रचना में ....
निहारा 
संवारा 
फ़ैल गई वो 
छाया बनकर ....
पक्षी 
चहचहा उठे 
बूँदें 
थिरकने लगी 
पत्तियां 
जगमगाने लगी 
और, हवाएं 
महक उठी.. 
उस मीठी 
खुशबू से ....

इधर 
कई दिन से 
कुछ सेहतमंद लोग 
हो गए है 
जागरूक 
जब देखो ,तब 
उठा लेते है 
पत्थर 
ढांपने लगे है 
पैरों तले की 
जमीन .........

कौन समझाये 
????????

पक्के फर्श पर 
नहीं उगा करते 
पेड़......
और फैली जडें 
उखाड़ फैंकती है 
पत्थरों  को भी ..................

("काव्य-लहरी " में प्रकाशित )












18 टिप्‍पणियां:

  1. फैली जडें उखाड़ फैंकती है पत्थरों को भी ..................

    निश्चित ही!
    सुन्दर रचना!

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  2. पक्के फर्श पर
    नहीं उगा करते
    पेड़......
    और फैली जडें
    उखाड़ फैंकती है
    पत्थरों को भी .......सच्चीईईईईईईईई

    उत्तर देंहटाएं
  3. कुछ सेहतमंद लोग
    हो गए है
    जागरूक
    जब देखो ,तब
    उठा लेते है
    पत्थर
    ढांपने लगे है
    पैरों तले की
    जमीन .........

    बेहतरीन,शानदार,लाजवाब...........हैट्स ऑफ इसके लिए|

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  4. बहुत ही अच्छी अभिवयक्ति.....

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  5. बेहद .....ख़ूबसूरत....बहुत ही अच्छा....वाह...सब कुछ ...जैसे.....

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  6. अनुपमा जी ,रश्मि जी,सुषमा जी शुक्रिया ....

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  7. धन्यवाद इमरान जी ,ये पंक्तियाँ आज की हवाओं का रुख है ....हैट्स आफ ऐसी कोई बात नही ,आपने पढ़ा,सोचा यही पोस्ट के लिए काफी है .....फिर भी इसके लिए बहुत शुक्रिया

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  8. भावों का समंदर है यह रचना ... अच्छी लगी .

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  9. और फैली जडें
    उखाड़ फैंकती है
    पत्थरों को भी ..................
    जज्बा बहुत पसंद आया ...
    शुभकामनायें ...

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  10. वाह! बहुत सुन्दर.
    आपकी प्रस्तुति पढकर मन प्रसन्न हो गया है.
    संगीता जी की हलचल का वास्तव में नायब हीरा है आपकी यह सुन्दर प्रस्तुति.

    आभार.

    मेरे ब्लॉग पर आपका हार्दिक स्वागत है.

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  11. पक्के फर्श पर
    नहीं उगा करते
    पेड़......
    और फैली जडें
    उखाड़ फैंकती है
    पत्थरों को भी

    बिलकुल सही कह रही हैं आप।

    सादर

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  12. बहुत ही अच्छी अभिव्यक्ति .......

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  13. गहन सोच और सशक्त अभिव्यक्ति अंजू जी ! इतनी सामयिक एवं सारगर्भित रचना के लिये बहुत बहुत बधाई !

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  14. अंजू जी,..
    भावपूर्ण रचना के लिए बहुत२ बधाई,...

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  15. आप सबका थे दिल से शुक्रिया ,अभिवादन ....

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  16. पक्के फर्श पर
    नहीं उगा करते
    पेड़......
    और फैली जडें
    उखाड़ फैंकती है
    पत्थरों को भी ..................
    anupam......wah.

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