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बुधवार, 8 जून 2011

अंतर

अंतर है 
मंदिर के पत्थर 
और 
रास्ते के पत्थर 
 में 
इतना ही 
एक पर 
विश्वास किया 
तुमने ...
और 
दूसरे ने 
तुम पर .......

शुक्रवार, 3 जून 2011

औरत

रचना से 
रचित का 
  सफ़र 
तय करती है 
बड़ी ही 
तन्मयता से ,
प्रेम से ,
समर्पण से ....
पर ,मंजिल 
नहीं आती 
कभी हाथ ,
आती है 
तो 
छूट जाती है 
सफ़र की 
दीवानगी में .....! 

मंगलवार, 31 मई 2011

आधार

प्रेम से


देखा


तो हो गया


निर्विकार .....!! ! !


ज़रा सी


अनदेखी


और फैलता


कितना


विकार.......??? ? ? ?

सफ़र

कभी कभी
यूँ
चली आती है
जैसे हवा,
जैसे किरण
या फैंक दे
कोई
ठहरे हुए
पानी में
कंकर ....
बहुत
जानलेवा
होता है ये
भंवर ~~~~
फिर भी
कहाँ
रुकता है
याद का
सफ़र.........

मंगलवार, 17 मई 2011

सुर और ताल

वेद'
बन गए वाद
'शास्त्र'
बन गए शस्त्र
और ‘गीता’
रह गई बन कर गीत
'कौन हैं' जो
सुर पहचाने
'कौन है' जो
ताल मिलाए
बैठे हैं सब के सब
जाल बिछाए......

अधिकार ..............

अधिकार खरपतवार हो गए
कर्त्तव्य दरकिनार हो गए .....
अत्याचार बढ़े इतने
कानून खुद शिकार हो गए .....
अर्थ जाल का बोलबाला
शब्दकोष निस्सार हो गए .....
बेलें बन गई पेड़ यहाँ पर
पेड़ गुनाहगार हो गए .....
कौन सुनेगा, किस से कहोगे
गूंगे बहरे राजदार हो गए .....
देख, सुन, और ओढ़ ले चुप्पी
साये तक दीवार हो गए .....
सोच हुई गुलाम जिस्म की
जिस्म अब अखबार हो गए .....
अच्छे लोग बहुत यहाँ है
बुरे अब दुशवार हो गए .....
सोच के दायरे फैले इतने
रिश्ते तक व्यापार हो गए .....


(" दैनिक ट्रिब्यून चंडीगढ़ में प्रकाशित )

सोमवार, 28 मार्च 2011

वो जब .........

वो जब पास नहीं होता बहुत ही पास होता है
जुदाई का ये रंग बहुत ही खास होता है ...

न बंदिश न रवायतें ,न शिकवा-शिकायतें
रूह-ऐ-पाकीज़गीका खूबसूरत अहसास होता है ...

पलकों के आसमान पर चमकते है सितारे ,
लरज़ते होठों पर भीगता इक मलाल होता है...

रगों में घुलता है कोई रंग खुशबू बनकर ,
ख़ामोशियों का न फिर कोई सवाल होता है ...

रविवार, 6 मार्च 2011

दहलीज़


उसके
घर तक पहुँचना
बहुत
आसान है
पर..
इतना भी नहीं
क्यूंकि ,
उसके
घर के बाहर
कोई
दहलीज़ ही नहीं ..!!!

शनिवार, 5 मार्च 2011

अमृता



नदी बन कर
बहती रही~~~~~~
अपने ही किनारों
को लिया खोर
इस बहाव में..........और
बन गई
अथाह समन्दर-
जहॉ, ना किनारे हैं
ना नदी,
है तो
बस विस्तृत
फैला अस्तित्व..
गहराई में जिसकी
छिपे हैं खज़ाने
तुम्हारे अनमोल
अस्तित्व के...

शनिवार, 26 फ़रवरी 2011

आदत.......................................


सागर गहरा था,
हो गया
और गहरा -
जब से
डूबना
आदत सी हो गया....  








आदत .....

तेरी आदत से तू मजबूर ...

मेरी आदत से मैं ....

अपनी अपनी आदत से देखें

दोनों चलते हैं कितनी दूर ........!!

           




आदत .......
जब हो जाये तो जाती भी नही ....
उसके बिना कोई शै भाती भी नही ...... :(  :(