मंगलवार, 17 मई 2011

सुर और ताल

वेद'
बन गए वाद
'शास्त्र'
बन गए शस्त्र
और ‘गीता’
रह गई बन कर गीत
'कौन हैं' जो
सुर पहचाने
'कौन है' जो
ताल मिलाए
बैठे हैं सब के सब
जाल बिछाए......

7 टिप्‍पणियां:

  1. आपने बहुत सुन्दर शब्दों में अपनी बात कही है। शुभकामनायें।

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  2. धन्यवाद , डॉ.वर्षा सिंह जी

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  3. कल 02/07/2012 को आपकी यह बेहतरीन पोस्ट http://nayi-purani-halchal.blogspot.in पर लिंक की जा रही हैं.आपके सुझावों का स्वागत है .
    धन्यवाद!

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  4. बहुत सुन्दर.....
    गहन अर्थ लिए हुए है आपकी नन्ही सी रचना....

    सादर
    अनु

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  5. बैठे हैं सब जाल बिछाए...
    सचमुच...

    सुन्दर रचना...

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  6. यथार्थ कहती सुन्दर रचना..
    :-)

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