रविवार, 7 अगस्त 2011

दोस्त

दोस्त 
दो सत 
जैसे सूरज 
जैसे सागर 
तभी तो 

होता है विरक्त ...
रज से 
तम से 
बंधता है सम 
सिर्फ 
सत से ......

9 टिप्‍पणियां:

  1. मित्रता पर बहुत सुन्दर रचना....

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  2. अंतर्मन को उद्देलित करती पंक्तियाँ, बधाई

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  3. सुंदर प्रतिक्रिया के लिए शुक्रिया शरद जी ,संगीता जी ,वर्षा जी और इमरान जी

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  4. नमस्कार....
    बहुत ही सुन्दर लेख है आपकी बधाई स्वीकार करें
    मैं आपके ब्लाग का फालोवर हूँ क्या आपको नहीं लगता की आपको भी मेरे ब्लाग में आकर अपनी सदस्यता का समावेश करना चाहिए मुझे बहुत प्रसन्नता होगी जब आप मेरे ब्लाग पर अपनी उपस्थिति दर्ज कराएँगे तो आपकी आगमन की आशा में पलकें बिछाए........
    आपका ब्लागर मित्र
    नीलकमल वैष्णव "अनिश"

    इस लिंक के द्वारा आप मेरे ब्लाग तक पहुँच सकते हैं धन्यवाद्

    1- MITRA-MADHUR: ज्ञान की कुंजी ......

    2- BINDAAS_BAATEN: रक्तदान ...... नीलकमल वैष्णव

    3- http://neelkamal5545.blogspot.com

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  5. सुन्दर ब्लोग पर सुन्दर काम और शानदार रचना १
    बधाई !

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