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मंगलवार, 9 जुलाई 2013

धरती ...बादल .......बरसात ..........{ दो कवितायें }



कल ,
बरसात में 
धरती का इक टुकड़ा 
 गया था भीग ..... 
बहुत  खुश थी 
उसकी सौंधी खुशबू 
समेटने में ........

आज 
यकायक ,बरस पड़ा 
सूरज का आक्रोश 
उसी टुकड़े पर ...
नमी हो गयी गायब 
और वो 
गिनने लगी द्र्रारे 
पपड़ाई जमीन पर ..................

{.....अनन्या .....}

..............................................................................................

                             (२)          


देख , बादल को  
भटकते ,
फैला दी बाहें  
धरती ने ,और 
दे दी पनाह 
अपने आँचल में

......

अगली सुबह 
देखा 
मुस्कुरा रहा था 
नीला आकाश 

लेकिन 
नम था 
धरती का आँचल 
शायद 
रात भर रोने के कारण ...........!!





[( अनन्या ) ...
कविता संग्रह "काव्य लहरी " से ]

7 टिप्‍पणियां:

  1. बहुत ही सुंदर अभिव्यक्ति, यहाँ भी पधारे
    रिश्तों का खोखलापन
    http://shoryamalik.blogspot.in/2013/07/blog-post_8.html

    जवाब देंहटाएं
  2. विसंगतियों के बीच ही पनपता है जीवन......सुन्दर ।

    जवाब देंहटाएं
  3. कोमल भावो की और मर्मस्पर्शी.. अभिवयक्ति ....

    जवाब देंहटाएं
  4. कोमल एवं मन को गहरे तक छू लेनेवाले सुन्दर भावोँ की अभिव्यक्ति । बधाई । सस्नेह

    जवाब देंहटाएं
  5. अच्छी रचनाओँ की आशा करता हूँ । शुभकामनाएँ । सस्नेह

    जवाब देंहटाएं
  6. अच्छी रचनाओँ की आशा करता हूँ । शुभकामनाएँ । सस्नेह

    जवाब देंहटाएं